साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई, दैनिक लेखन क्रमांक :-7

नमन 🙏 :- साहित्य संगम संस्थान, पश्चिम बंगाल इकाई
दैनिक लेखन क्रमांक :- 7
दिनांक :- 01/11/2020
दिवस :- रविवार
विषय :- स्वैच्छिक
विषय प्रदाता :- आ. राजवीर सिंह मंत्र जी
विषय प्रवर्तक :- आ. कलावती कर्वा जी
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जय माँ शारदे 
#नमन_साहित्य_संगम_संस्थान 

#विषय_प्रवर्तन 

विषय-स्वैच्छिक
विधा-स्वैच्छिक
दिनाँक - 1/11 /2020 
दिवस - रविवार 

पिछले रविवार को साहित्य संगम संस्थान की बंगाल प्रदेश इकाई के उद्घाटन के पश्चात आइये हम सभी आज प्रथम रविवार को अपने रचनाधर्मिता का प्रस्तुतिकरण इस मंच पर करे। 

 सर्वप्रथम सभी कलमकारों , सृजनकर्ताओं , माँ शारदा के वरद पुत्रों, भगवती सरस्वती स्वरुपा बहनों आप सभी का साहित्य संगम संस्थान की बंगाल इकाई में हार्दिक स्वागत है, अभिनन्दन है। 

 बंगाल प्रदेश इकाई समुह में आप सभी का भरपूर सहयोग मिल रहा है जिसके लिए बंगाल इकाई समुह आप सभी का हार्दिक आभार व्यक्त करते हुए आप सभी को बहुत-बहुत बधाई हार्दिक शुभकामनाएं देते हुए आपके उज्जवल भविष्य की मंगल कामना करता हैं।

कवि मन को नियंत्रित करना कवि की कल्पनाओं और उड़ानों को सीमित करने की कोशिश करने जैसा लगता है। अतः कल्पनाओं की असीमित परिधि रहित उड़ान भरते हुए आइये  हमसब अपना सर्वश्रेष्ठ व्यक्त करनें का प्रयास करें। मन के सुंदरतम भाव को प्रेम-अनुराग  से ओत-प्रोत करते हुए साहित्य के उपवन में रंग बिरंगे कुसुम क्यारियों के अनेकानेक बहुरंगी पुष्पों से भ्रमर की भाँति श्रेष्ठ पराग संकलित सुपोषित कर मधुघट को संजोये विविध स्वैच्छिक सृजन के साथ पटल पर अपनी उपस्थिति दर्ज करें। आप कलमकारों की बहुरंगी कल्पनायें निश्चित रुप से विविध स्वैच्छिक विषयों पर मुक्त विधा में  सृजन के रूप में सरगम सुनायेंगी और लेखनी प्रभावी एवं बलशाली होगी।  

आप सभी का बंगाल इकाई के सृजन में हार्दिक स्वागत करते हुए स्वैच्छिक विषय पर मुक्त विधा में अपने अपने सृजन  के साथ आपको आमंत्रित करते हुए मैं गर्व की अनुभूति कर रही हूँ।

आप सभी से सादर अनुरोध है कि आप अपनी रचनायें कमेंट बॉक्स में पोस्ट करें साथ ही स्वतंत्र रूप से पटल पर भी पोस्ट करें।

अपनी पोस्ट के साथ साहित्य संगम संस्थान और विषय में #हैश टैग का प्रयोग अवश्य करें
आप सभी अपनी रचना को इसी पोस्ट के कॉमेंट बॉक्स में प्रेषित कर पृथक भी पोस्ट कर सकते है 

आज आप सभी पिछले रविवार को हुए उद्घाटन समारोह पर अपनी अनुभूति जाहिर कर हमे अपने विचारों से अवगत करा सकते हैं। 

धन्यवाद !

 अध्यक्ष,
साहित्य संगम संस्थान, बंगाल इकाई।
 कलावती कर्वा
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#साहित्य संगम संस्थान प बंगाल इकाई
दिनांक १-११-२०२०
विषय स्वैच्छिक
विधा  स्वैच्छिक

बेटियों को न्याय मिले,
उनके साथ होने वाले पाशविक अत्याचारों से,
मुक्ति मिले ऐसे जघन्य अपराधों से,
कड़ी से कड़ी सजा मिले अपराधियों को।
इससे किसी को कोई गुरेज नहीं,
हर कोई चाहता है ऐसा,
हर तरफ से उठ रही आवाजें,
बहुत हो गया, सहन नहीं होता अब।
केवल कैंडिल मार्च निकालने, नारेबाजी करने से,
कुछ बदलने वाला नहीं, चलता रहा है और
चलता रहेगा सब कुछ पहले जैसा।
जब तक समाज का हर वर्ग,
भुलाकर सभी भेद, एकजुट होकर,
बेटियों की रक्षा में आगे नहीं आएगा।
सरकारें, प्रशासन, जाँच एजेंसियाँ,
घटना हो जाने के बाद करती हैं अपना काम,
घटना न हो, इसके लिए हमें ही करना होगा इंतजाम।
खुद से करें प्रश्न यदि उनकी अपनी बहन बेटी के साथ ,
ऐसा घिनौना कृत्य हो, तो क्या कर्तव्य होगा उनका,
यही समझ कि समाज की हर बहन बेटी उनकी अपनी ही है,
उनके सुरक्षित घर पहुँचाने की जिम्मेदारी उनकी है,
धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा।

✍️ फूल चंद्र विश्वकर्मा
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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल मंच को नमन।
#दिनांक :  01 नवंबर  2020.
#दिन : रविवार।
#विषय : स्वैच्छिक।
#विधा : स्वैच्छिक।

               ।रचना।

अजनबी होते  रिश्तों  के भीड़ में,
अनिश्चित सा  एक  जीवन  लेकर,
पहचान  कैसे कोई  आखिर  करें,
रिश्ता कौन, अपना,  कौन पराया।

मनु की वह दुनिया तो अच्छी थी,
उसे तो फिर से निर्माण करना  था,
इस निर्मित दुनिया का क्या  करें?
जहां हर तरफ छल कपट भरा  है।

दोस्ती  में  दुश्मनी निभाई जाती है,
मोहब्बत में बेवफाई छुपाई जाती है,
दोस्ती और दुश्मनी में फर्क कैसे करें,
दोस्ती में  यहां दुश्मनी पाई जाती है।

विनाश की  लीला देख कर के भी,
जी अभी तक किसी का भरा नहीं,
प्रेम गीत सुनाती  थी कभी  जिंदगी,
अब  जिंदगी  यह  वीरान लगती  है।

दोस्ती  दुश्मनी शब्द बन कर रह गए,
दोस्ती में छल कपट देखो ना भर गए,
दोस्ती  दुश्मनी नहीं  यहां है  किसी से,
दोस्ती और दुश्मनी के अर्थ  बदल गए।

         

                   ✍️       दामोदर मिश्र बैरागी,
                          मेदिनीनगर, पलामू , झारखंड।
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नमन मंच
साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
विषय स्वैच्छिक
दिनांक 01/11/2020

गीत

उठो सबेरा सोते क्यों
सो कर जीवन खोते क्यों ।।

नव किरण ये जीवन ज्योति
सुखमई होते किरणों के मोती
गम का तिमर ढोते क्यों
सो कर जीवन खोते क्यों ।।

कर्म गति की भोर हुई
मन की दुनिया चितचोर हुई
बुरे कर्म फिर बोते क्यों
सो कर जीवन खोते क्यों ।।

नई किरण जीवन में जोश भरें
ऊर्जा जीवन को मदहोश करें
फिर जीवन में तुम रोते क्यों ।
सो कर जीवन खोते क्यों ।।

✍️  अमित कुमार बिजनौरी
कादराबाद खुर्द
स्योहारा बिजनौर
उ०प्र०
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#साहित्य संगम संस्थान प बंगाल इकाई
दिनांक १-११-२०२०
विषय स्वैच्छिक(कृष्ण भक्ति)
विधा  स्वैच्छिक(मदिरा सवैया)
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मैं अरदास करूँ जग से जब आग लगी मन की तन की।
रोक सके न कभी मुझको यह आस रही अब जीवन की।
चातक मैं बनके फिरता बस बूंद गिरे इक सावन की।
आन मिलो हमको तुम हे हरि प्यास बुझे अब नैनन की।

रास रसे नित ग्वालन संग कहे जग माखन चोर इन्हें।
तीर चले यमुना नद की जब खींच रही इक डोर इन्हें।
याद करे जब पीर मिले कहते सब तारण हार इन्हें।
प्रेम करें हम से यह भी मिलता हम से जब प्यार इन्हें।

✍️  मनोज कुमार पुरोहित
अलीपुरद्वार, पश्चिम बंगाल
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# नमन मंच

#साहित्य संगम संस्थान, पश्चिम बंगाल इकाई

# दिनांक : ०१/११/२०, रविवारवार

# विषय : स्वतंत्र

# विधा : कविता (स्वतंत्र)



रिश्तों की अहमियत


रिश्ते तो अनमोल मोती हैं साहब!

रिश्तों की हर वक्त कद्र कीजिए

दरअसल रिश्तों की यह डोर

होती है बहुत ही कमजोर

हकीकत यह कि रिश्तों में कोई बंधन नहीं

अपितु एक एहसास होता है

और एहसास के खत्म होते ही

रिश्ता कांच की भांति टूट जाता है

एक बार टूटने पर लाख कोशिशों के बावजूद

वह कभी नहीं जुड़ नहीं पाता है

बेशक रूठिए इंसान की बातों से उस व्यक्ति से नहीं

उसकी गलतियां नजरंदाज करें ना उस व्यक्ति को

क्योंकि रिश्तों की बड़ी अहमियत है

रिश्तों से बढ़कर कुछ भी नहीं

रिश्तों का जुड़ाव तो दिल से होता है

अपने सपनों को पूरा करने हेतु

कभी भी अपनों से दूरी बढ़ाना

किंचित उचित नहीं, क्योंकि

अपनों के बिना ये जिंदगी बेमानी है

किसी की अनुपस्थिति में तो

यह जिंदगी कट ही जाती है

पर अपनों के बिना यह ज़िन्दगी

एक पल गुज़र नहीं पाती है

रिश्तों की तुलना धन से करना भी

कतिपय उचित नहीं

क्योंकि धन तो कुछ ही दिन काम आयेंगे

पर रिश्ते आजीवन साथ निभायेंगे

रिश्ता दोस्ती का हो या पति - पत्नी का

मां - बाप या फिर बाप बेटी का

हर रिश्ते की अपनी अहमियत है

पर रिश्तों में अनुराग व़ प्रेम की जरूरत है

रिश्ते टूट जाते हैं यदि मन में विकार और अहंकार है

रिश्तों में होता है अपनापन

जब नहीं क्लेश,द्वेष का आवाहन

बस एक दूजे के प्रति हो भाव समर्पण

और प्रफुल्लित हो हर पल वातावरण

छोटों को मिले अपार स्नेह व़ बड़ों को उचित आदर

रिश्तों में सतत् प्रवाह हो जैसे सरिता सागर

रिश्तों में मृदुत़ा हो ,न कोई कटुतापन

व्यवहार भी सहज़ न कोई कड़वापन

आपसी सहयोग और विश्वास का न अभाव हो

अशिष्टता और अभद्रता का न लेशमात्र भान हो

क्योंकि हर एक रिश्ता ख़ास है

जो कोई भी आपके साथ है

रिश्तों की बहुत अहमियत है

क्योंकि रिश्ते के हर किरदार को 

एक दूसरे की जरूरत है।


✍️  राजीव भारती

गौतम बुद्ध नगर नोयडा

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नमन
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनाँक: 01.11.2020
विषय: विषय मुक्त
(केंद्रीय सतर्कता विभाग द्वारा दिनांक 27 अक्टूबर से 2 नवम्बर तक सतर्कता जागरूकता सप्ताह मनाई जा रही है। आज पटल विषय मुक्त है अतः मैं सतर्कता आयोग के विषय #सतर्क_भारत_समृद्ध_भारत पर अपनी रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ। सादर..)
*समृद्ध भारत, सतर्क भारत*
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भ्रष्ट लोग के जाल में,
फँसा है मेरा देश ।
दीमक बनकर चाटते,
नष्ट करे परिवेश ।।

उल्लू है हर साख पे,
नोंच रहें है पात ।
दिखलाएं मिलकर सभी,
इन सबको औकात।

भारत तभी समृद्ध जब,
जनता रहे सतर्क।
बरना इक दिन देश का,
होगा बेड़ा गर्क ।।

गलत देख चुप ना रहें,
कर बुलन्द आवाज।
मेरे प्यारे देश को,
आप सभी पर नाज।।

खुद गलत मत कीजिए,
करने दें न औऱ ।
भ्रष्टाचारी को कहीं,
मिले नहीं अब ठौर।।

कार्यालय में गर कहीं,
होता भ्रष्टाचार ।
कोई काम के बदले,
पैसे ले दो-चार ।।

गलत कमाई जो करे,
माफ करें न आप।
सतर्कता विभाग को,
खबर करें चुपचाप।।

घूसखोरी न माफ हो,
मंजिल उसका जेल।
भ्रष्ट मुक्त होकर चले,
भारत की यह रेल।।

✍️ ✒ *विनय कुमार बुद्ध*,

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# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
विषय- स्वैच्छिक
विद्या- कविता

         ✍️शस्त्र सम्भालो✍️
उठो साधु-संतों अब शस्त्र सम्भालों,
अब राम-कृष्ण बचने तुम्हें न आएंगे,
कब तक सरकार भरोसे तुम बैठोगे,
कब तक सरकार भरोसे तुम बेठोगे,
कब तक आस लगाए तुम बेठोगे,
बिकी हुई मीडिया के दलालों से,
कैसी रक्षा की भीख मांग रहे हो,
झूठे दुःशाशन के दरबारों से तुम,
साधु-संतों  को मार  जा  रहा हैं,
जिनकी निर्मम-हत्या हो रही हैं,
जो खुद ही  लज्जाहीन पड़े  हैं,
वो क्या तुम्हें आज बचाने आएंगे,
उठो साधु-संतों  शस्त्र  सम्भालों,
अब राम-कृष्ण बचाने तुम्हें न आएंगे,
कल तक देश का अंधा- कानून था,
अब गूंगा-बहरा दुःशाशन दरबार हैं,
इन्होंने .............,
हाथ बांध दिए-होठों पर जड़ दिए ताले,
कानों पर भी लगा दिए हैं अब पहरे,
अब  तुम्हीं  बताओं ये आँसू तुम्हारे,
ये किसको यहाँ क्या समजाएँगे ?
उठो साधु-संतों अब शस्त्र सम्भालों,
अब राम-कृष्ण तुम्हें न बचाने आएंगें,
अब छोड़ो तुम शास्त्र और पूजा-पाठ,
झालर-शंख  और  नगाड़े  बजाना,
अब बाजूओं में अपना दम भरलों,
खुद ही अपनी रक्षा की ठान लो,
धूर्त शकुनि बैठे हैं पासे अपने फेंके,
मंदिर की जमीनें जान तुम्हारी ले लेंगीं,
धीरे-धीरे सब साधु-संत खत्म हो जाएंगे,
उठो साधु-संतों अब शस्त्र सम्भालों,
राम- कृष्ण  तुम्हें  बचने  न  आएंगें !!
       ✍️चेतन दास वैष्णव✍️
              गामड़ी नारायण
                      बाँसवाड़ा
                     राजस्थान
           
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
विषय -स्वेच्छिक़

'गौ माताकी जुबानी ""

मैँ आई द्वार तुम्हारे मुझे भीख प्राण की दे दो..
मैँ हूँ तुम्हारी माता ,तुम लाल का फ़र्ज़ निभा दो..

दुष्टों ने मुझे है घेरा ,संघर्ष बना घनेरा
चाबुक की बेंत से मारे,मुझे दे दो तुम सवेरा
मेरी तड़फ़ती मोत ना देखो

दुष्टों से मुझे बचा दो
मैँ हूँ तुम्हारी माता ,तुम लाल का फ़र्ज़ निभा दो..

चिंता ने मुझे सताया, चाहत का मिला क्या साया
मेरे बालक तुमको मुझपे,  क्यों तरस नहीं आया
अमृत सा दूध पिलाती

बेमोत ना मर जाने दो
मैं हूँ तुम्हारी माता, बेमोत ना मर जाने दो

यूँ तड़फ तड़फ कर मरना, क्या है अपराध मेरा
मैँ फर्ज निभाऊ माँ का, अब कर दो मेरा सवेरा
हे कृष्णा तुम कहाँ हो

धरती पर वीर जगा दो
मैं हूँ तुम्हारी माता, तुम लाल का फर्ज निभा दो

✍️  स्वाति(सरू)जैसलमेरिया
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# नमन मंच
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
# विषय :  स्वैच्छिक
# विधा: काव्य
# दिन :  रविवार
# दिनांक:०१/११/२०२०

चुनावी गीत (व्यंग)

आओ बच्चों तुम्हे दिखायें,
शैतानी शैतान की... ।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की...।।

बड़े-बड़े नेता शामिल हैं,
घोटालों की थाली में ।
सूटकेश भर के चलते हैं,
अपने यहाँ दलाली में ।।

देश-धर्म की नहीं है चिंता,
चिन्ता निज सन्तान की ।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की...।।

चोर-लुटेरे भी अब देखो,
सांसद और विधायक हैं।
सुरा-सुन्दरी के प्रेमी ये,
सचमुच के खलनायक हैं ।।

भिखमंगों में गिनती कर दी,
भारत देश महान की ।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की...।।

जनता के आवंटित धन को,
आधा मंत्री खाते हैं ।
बाकी में अफसर ठेकेदार,
मिलकर मौज उड़ाते हैं ।।

लूट खसोट मचा रखी है,
सरकारी अनुदान की ।
नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की...।।

थर्ड क्लास अफसर बन जाता,
फर्स्ट क्लास चपरासी है,
होशियार बच्चों के मन में,
छायी आज उदासी है।।

गंवार सारे मंत्री बन गये,
मेधावी आज खलासी है।
आओ बच्चों तुम्हें दिखायें,
शैतानी शैतान की...।।

नेताओं से बहुत दुखी है,
जनता हिन्दुस्तान की.... |

🖌️🖊️* ✍️~~*अभियंता प्रिंस कुमार*
*सोनदीपी, बेगूसराय ( बिहार)*

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#नमन मंच
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल ।
#दिनांक -01/11/2020
#विषय-स्वैच्छिक
#विधा- पद्य
#शीर्षक-'तुम पास हो तो'

जमाने में माना कि मुश्किलें कम नहीं,
मगर पास तुम हो तो कोई गम नहीं।

साथ गर तुम्हारा यूं ही रहेगा,
रुठ जाए किस्मत, उसमें भी दम नहीं।।

साथ चलने की कभी कसमें खाई थी हमने,
साथ निभाया भी जमाने में बदस्तूर तुमने।

कभी गर खुशियां रूठ गई भी होंगी,
तो मुस्कुराकर दिल को तसल्ली दी तुमने ।।

कभी धूप में तो कभी छांव में,
कभी घाव गहरे बने पांव में।

फिर भी हर कदम रही तुम साथ मेरे,
हार जीत जिंदगी के हर एक दांव में।।

पर जिंदगी के दिन अब तो ढलने लगे,
मेरे हमसफर कदम लड़खड़ानेे लगे।

दुनिया की देखी अनोखी ये फितरत,
अपने भी मुंह फेरकर जाने लगे।।

✍️  बेलीराम कनस्वाल
घनसाली,टिहरी गढ़वाल,उतराखण्ड।
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक-01.11.2020
#विषय-स्वैच्छिक
#विधा-स्वैच्छिक

मजबूरी
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ये कैसी मजबूरी है
जीवनभर
जिस औलाद की खातिर
माँ बाप
अपना हर सुख त्याग देते हैं,
बुढ़ापे में वही औलाद
अपने सुख सुविधा की खातिर
माँ बाप को
अकेला छोड़ जाते हैं।
ये कैसी मजबूरी है कि
औलादें ये क्यों नहीं
समझना चाहते
कि समय रुकता नहीं,
बुढ़ापा आने से कोई
रोक सकता नहीं।
आज हमनें माँ बाप को
अकेला छोड़ रखा है,
कल हमें अकेला होने से
कोई रोक सकता नहीं।
इतिहास दोहराया ही जायेगा
मेरा बेटा भी मुझे
बुढ़ापे में निश्चित ही
अकेला कर जायेगा।

✍️ ● सुधीर श्रीवास्तव
      गोण्डा(उ.प्र.)
  
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#साहित्य संगम संस्थान प. बंगाल इकाई
               मंच को नमन।🙏🙏
#दिनांक - 1-11-2020
#विषय   - स्वैच्छिक
#विधा    - मुक्तक (सामाजिक-संदेश)
#कवि     - राजकुमार प्रतापगढ़िया

                 ** मुक्तक **
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बडे़ पीपल के पेड़ के नीचे ,
सभा लगी थी आँखें भींचे।
कारण था, जो थे आरोपी ,
बेटे थे वो मुखिया जी के।।

अब मुखिया जी का बड़ा रसूख ,
गाँववाले थे इसीलिये मूक।
इक लड़की थी रोती-धोती
अस्मत गये आरोपी लूट।।

बेटी की माँ रो-रोकर ,
पंचो के पैरों में गिरकर।
हे न्यायाधीश , न्याय करो ,
हम तो गये जीते-जी मर।।

थे मुखिया जी हँसी दबाये ,
सोचे-समझे फिर फरमाये। (बोले)
साफ-साफ कहो बात है क्या ,
क्यों हो तुम लोग शोर मचाये।।

माँ बेटी की रो कर  बोली ,
सरपंच जी हमें मार दो गोली।
आपके बच्चों ने है लूटी ,
मेरी बिटिया जो थी भोली।।

सुनकर मुखिया कहीं खो गये ,
हुम् मेरे बच्चे जवान हो गये।
हमें पता क्यों चला ना अब तक ,
ऐसे कितने साल हो गये।।

फिर सम्भले और खुलकर बोले ,
न्याय यूँ होगा तुला जो तोले।
हाँ बच्चों तुम भी बतलाओं ,
क्यों भड़के थे तन को शोले।।

सूनकर हिम्मत पाये वो
बडे ने शब्द बताये जो ।
अस्त-वयस्त कर वस्त्र को अपने
बिस्तर पर रही लडकी सो।।

देख उसे मै रह ना पाया ,
मन की करके फिर पछताया।
छोटा तो बेकार है लिपटा
लड़की ने क्यों शोर मचाया।।

सूनकर कुकूर जैसे दंत ,
निकाल कर हँसते सारे पंच।
बेशर्मों की सभा में चुभते
हँसीं दिलों में जैसे कंच।।

फिर मुखिया ने की सुनवाई
गरज कर बोला सुन ले माई।
तेरी बेटी ने तोडा़ है
टीवी , टेबल और चारपाई।।

सारा ही इम्पोर्टेड माल था ,
नुक्सान पूरा ही पचास हजार था।
बोल उसे क्या चुका सकेगी ,
नही तो फिर, क्यों किया बवाल था।।

चल मै कर देता हूँ न्याय ।
जो तेरी गर समझ में आय।।
तू कर दिल को अपने साफ।
मै बेटों को दूँ समझाय।।

ना ऐसे यूँ हमको ताक ,
कितना बढ़िया है इसांफ ।
दो कौड़ी की इज्ज्त पर जा
किये पचास हजार पूरे माफ।।

सुनकर मुखिया जी की बात,
वाह-वाह कर रहे चाटूकार।
जमीं में रोकर धंसती जाती
न्याय वयवस्था पट्टी बाँध।।

तभी अचानक सभी कान ने,
सुनी आवाज थी जोर ठायँ से।
तीन गोली थी लगी तीनों में
तीनों गिर गये वही धाय से।।

जोर-जोर से अब बेटी थी
गला फाड़कर चीख रही।
ऐसा ही इंसाफ जरुरी
देश को मेरे आज अभी।-2

           ✍️(राजकुमार प्रतापगढ़िया)
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# नमन साहित्य मंचपटल पश्चिम बंगाल इकाई ।
# दिनांक .1 .11 .2020 .
# वार .आदित्यवार ।
# विषय .पनधट ।
# विधा .कविता ।
आज पनधट मुझे ,प्यासा ही लग रहा था ।
उसकी सुहानी यादें ,न जाने कहाँ खो गयी थी ।।
बेचारा अकेला अकेला ,आंसू बहा रहा था ।
एक समय था वहाँ ,नवयुवतियों की झंकार बजती थी ।।
मटको की धनधनाहट ,से वह खिलखिला उठता था ।
नवयुवतियों से मिलने ,को बेताब दिखता था ।।
पनधट का नजारा देख ,हर किसी का दिल नाच उठता था ।
वो सहेलियो की मुलाकाते ,कितनी सुहावनी होती थी ।।
वो सास ,ननद की बातें ,पनधट पर आकर युवतियाँ करती थी ।
उनकी बातें सुन कर ,पनधट नाच उठता था ।।
कुछ दुःख सुख की बातें ,नवयुवतियाँ सुनाया करती थी ।
आज बरसो हो गये ,पनधट उनकी राह देखता रहता ।।
आज पनधट सूना हो गया ,अपने दुःख से दुःखी हो गया ।
अपनी यादों को याद कर के ,पल में आंसू बहाता रहता ।।

✍️ बृजमोहन रणा ,कश्यप ,कवि ,काव्यांचल ,हाल .
अमदाबाद ,गुजरात ।

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#नमन मंच
#विषय: स्वैच्छिक (नेता जी)
#विधा: स्वैच्छिक (कविता)
#दिनांक:1\11\20
""""""""""""""""""""""""""""""""""
नेता जी, ओ नेता जी,
आप नहीं किसी के भ्राता जी,
काम हो तो हाथ जोड़ोगे,
नहीं काम तो नहीं पहचानोगे।

नेताजी क्या कहना आपका,
चमचों से घिरा कार्यालय आपका,
अत्याचार के आप प्रणेता,
दोषियों के मित्र आप वो राजनेता।

भोली भाली जनता है,
उनको ठगना आपका काम,
इस कुर्सी के हैं खेल निराले,
इसपर बैठ कमाएं आप नाम।

लालच की भूख है आपको,
सत्ता पाते ही आप भूले सबको,
जनता का कहांँ ख्याल है,
आप अपनी जेब भरने में बेहाल हैं।

जीत गए तो अपना दम भरते,
हारे तो ईवीएम पर दोष मढ़ते,
अपराधी हो या ठेंगा छाप,
सबको मिलती यहांँ चुनावी धाप।

हार नेताजी सह नहीं पाते,
बीपी बढ़कर बुखार चढ़ जाता,
नेताजी की जब कुर्सी जाती,
तब वो कुछ कह नहीं पाते।

इन लोगों ने की है मनमानी,
लूटा देश को हुई जनता की हानि,
अब हम नेताओं की नहीं सुनेंगे,
अपनी बुद्धि विवेक का उपयोग करेंगे।
******************

✍️  अभिलाषा "आभा"
गढ़वा (झारखंड)
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#सहित्यसंगमसंस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय-चुनाव
#विधा-मुक्त

चुनावी मौसम है आ गया,
वादों और दावों के खेल शुरू हुआ।
जनता है मोहरा बनी,
जनता पर लग रहा है जुआ।
वादों से भरमा रहे,जनता को बेवकूफ बना रहे,
जाति के नाम पर वोट की राजनीति कर चुनावी चाल दिखा रहे।
पाँच वर्ष जनता की याद आती नही,
ये देखो कैसे अब मेहरबानी दिखा रहे।
लगता है वही सबसे बड़े शुभचिंतक है,
उनके अलावा कोई नही हित समर्थक है।
भाई भतीजावाद का बीज पनपा रहे।
अपना घर भर जाये उससे ही मतलब है,
जनता का घर खाली हो इससे क्या मतलब है।
चुनावी मौसम आ गया
वादों और दावों के बाजार गर्म हो गया।
भोली भाली जनता लच्छेदार  बातों में फँस रही,
उन्हें लगता है कि उनकी जिंदगी सँवर रही।
चुनावी चाल है नही समझ पाते हैं,
नेताओं के चाल में यूँ फँस जाते हैं।
चुनावी मौसम आ गया,
वादों और दावो का बाजार गर्म है।

✍️ रूचिका राय
,सिवान बिहार
_______________________________________
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#मंच को नमन
#विषय:स्वैच्छिक(रिश्तों का मेला)
#विधा:स्वैच्छिक (कविता)
#दिनांक :01/11/2020
#दिन :रविवार

*रिश्तों का मेला*

रिश्तों का मेला
बड़ा अलबेला
इस संसार मे
अनमोल है माँ का रिश्ता
जिसने हमें जन्म दिया
पाल पोस कर बड़ा किया
अपना स्तनपान कराया
अपना निवाला हमें खिलाया
पिता का रिश्ता
वटवृक्ष और उसकी टहनी सा
अपना सर्वत्र जीवन अपने बच्चों
के जीवन सुधारने मे लगा देता
मौन रह कर भी मग्न रहता
भाई का रिश्ता भी अनमोल है
हर मुश्किल मे साथ रहता
राम का साथ देता लक्षमण जैसा
बहन का रिश्ता भी कम नहीं
भाई के हाथ मे राखी बांधती
सारी खुशियाँ मिले यही दुआ मांगती
पत्नी का रिश्ता भी अनमोल
जीवन भर साथ निभाने का वादा करती
सुख दुःख मे सहभागी, अर्धागनी बनकर
दोस्त का रिश्ता किसी से कम नहीं
जैसे प्रभु श्री राम और बानरराज सुग्रीव का
रिश्ते तो बहुत है भाभी,चाचा-चाची,
फूफा-फूफू ,मामा-मामी, मौसा-मौसी,
दादा-दादी, नाना-नानी, आदि
बड़ो का सम्मान करो, छोटो को प्यार दो
रिश्ते सदा सत्य,निष्ठा, प्यार,
निश्छल भाव पर ही टिकते
सबसे बड़ा रिश्ता मानवता का
सदा अच्छा सबसे व्यवहार करो

✍️  शिवशंकर लोध राजपूत
(दिल्ली)

_______________________________________
नमन मच
# साहित्य संगम संस्थान बंगाल इकाई
# विषय  - स्वैच्छिक
विधा -कविता
दिनाँक --01-11-2020
**********************

📚✒️
(निराशा के बीज से ऊपजी एक कविता)

   **आशा और निराशा**
_____________________

जीवन में
जितना कष्ट
दुख और सुख से
नहीं हुआ है ,
उससे सौ गुना
कष्ट
आशा से हुआ है |
*
आशा  से
मेरा  संबंध
हमेशा अनैतिक ,
और निराशा से
नैतिक रहा है |
ये  बात
किसी और ने नहीं ,
मैंने कहा है |
**
आशा हमेशा
मेरे से दूर
भागती रही ,
निराशा दुख में भी
गले लगाती रही |
***
जब क्षणिक
आशा आती 
तो निराशा
मेरे पीछे छुप जाती ,
उसके जाने के बाद
फिर आकर
गले लग जाती |
****
उम्मीद बंधाती
आंसू पोंछती
मन में उपजे
दर्द और
कुंठा को सहलाती ,
आशा
सालों साल तक
नजर नहीं आती |
*****
आशा को
चाहने वाले
कदम कदम पर
मिलते ,
निराशा को
स्वीकारने
और चाहने वाले,
हमीं मिलते |
******
निराशा मुझे
कभी निराश
नहीं करती ,
सदा उत्साह
और उमंग
बढ़ाने का
काम करती |
*******
निराशा को
लोग
गलत समझ बैठते हैं ,
आशा के
न मिलने पर
निराशा को ही
कोसते हैं |
********
आशा
हाथ लगे न लगे
पर निराशा
हमेशा
हाथ लगती है ,
मेरे दुखों में
कदम से कदम
मिलाकर
खड़ी रहती है |
*********
आशा क्षणिक
पर निराशा
स्थायी होती है |
निराशा को मैं 
हमेशा
स्वीकार करता हूँ ,
क्योंकि वह
हमारे हिस्से में रहती है |
**********
लोग आशा को अच्छी
और निराशा को
बुरा क्यों कहते हैं ?
अगर निराशा
इतनी ही बुरी है
तो लोग इसे
सहते क्यों हैं ?
***********

✍️  एम. एम. अंसारी (शिक्षक)
कोलकाता- 24
पश्चिम बंगाल
_______________________________________

#साहित्यसंगमसंस्थानपश्चिमबंगालइकाई को सादर नमन
#दिनांक-०१/११/२०२०
#दिन- रविवार
#विषय- बचपन
#विधा- कविता

बचपन हमारा था ,
सचमुच में प्यारा,
जब अम्मा के आँखों का, होता था तारा ||

कितनी शरारत थी,
हममें भरी,
फिर भी दादी रहती,
संग में खड़ी,
मन मोहक होता था,
तब सब नजारा |
जब अम्मा के आँखों का, होता था तारा ||

बाबा के संग मिल,
मैं खाना खाता था,
गाँव की तल्लैया में,
रोज ही नहाता था ,
सब उँगली पकड़ हमको,
देते सहारा |
जब अम्मा के आँखों का, होता था तारा ||

आँचल के नीचे ही,
रोज सोया करता था,
जन्नत सी गोद में,
हर रोज खोया करता था,
कोई लौटा दो वो,
खोया बचपन हमारा |
जब अम्मा के आँखों का, होता था तारा ||

गय्या का दूध,
मैं गिलासे से पीता था,
हर दिन मैं सबके,
दिलासे से जीता था,
मिट्टी के संग रंजन,
लगता था प्यारा |

बचपन हमारा था,
सचमुच में प्यारा
जब अम्मा के आँखों का, होता था तारा ||

✍️ #प्रमोद #यादव “रंजन गोण्डवी”
जनपद- गोण्डा (अवध)
उत्तर प्रदेश
मो. 9161774386
_______________________________________
#नमन मंच
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल ।
#दिनांक -01/11/2020
#विषय-स्वैच्छिक
#विधा- पद्य
#शीर्षक- अबोध कन्या

ना  जाने  क्यों  लोग  स्वांग  रचते  हैं..
मीलों  चलते  हैं  दर्शन  को
और  उपवास  करते  हैं..
कन्या  पूजन कर  नवरात्री  में
उसका  सम्मान  करते  हैं..
अगर  जन्म  लेले किसी  घर  में
दुर्भाग्य़ मान  उसका  तिरस्कार  करते  हैं..
जननी को  भी  व्यंग्य बाणों से  शर्मशार करते  हैं..
अब  तो  बात  कुछ  और  ही  चल  निकली
गर्भावस्था में  ही  जाँच  करवाते  हैं
लड़की  हो  तो  भ्रूण  हत्या  से  भी
नहीं  हिचकिचाते  हैं..
माना  वंश  की  लकीर बढ़ाने  को
पुत्र  रत्न  ज़रूरी है
पर  क्या  स्त्री  बिन
हो  सकती  यह  इच्छा  पूरी  है ?
सृष्टि  की  रचना  जिस  बिन अधूरी है
जन्म  से  ही  हो  उसका  अपमान  क्या  ज़रूरी  है
अवसर दो  अगर  सफलता  की  शिखर  छू  ज़ाती  है 
कभी  कल्पना  चावला  और  कभी  मैरीकाम  बन
देश  का  गौरव  बन  ज़ाती  है..!!

✍️...आभा  सिंह ✍
लखनऊ उत्तर प्रदेश
_______________________________________
#साहित्य_संगम_संस्थान

मनोरम छंद पर आधारित रचना
शीर्षक- रामधारी सिंह दिनकर

हिन्दी का करने श्रृंगार,
दिनकर जन्मित हुए बिहार।

अद्भुत कलम के रहे मीर,
सहज सरल लेखन गम्भीर।

समीक्षा कविता अरु निबंध,
खण्डकाव्य दिनकर-अनुबंध।

है उर्वशी सिंह हुंकार,
रश्मिरथी अरु हाहाकार।

आत्ममयी और चक्रव्यूह,
राष्ट्रकवि के सृजन समूह।

हिंदी के साहित्यिक नूर,
दिनकर-लेख क्रांति-भरपूर।

धीर-गँभीर ये कलमकार,
दिनकर हिंदी के अवतार।

✍️  अनामिका वैश्य आईना
लखनऊ
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान,  पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय : स्वैच्छिक
#विधा : कविता

माता और पिता
----------------------
नैतिकता की गर बात करें,
दिल बार-बार कहता ही है ।
सर्वस्व समर्पण जो कर दे ,
वो माता और पिता ही है ।।

अपने आँचल से पोंछ-पोंछ,
अपनी थपकी से ठोक-ठोक।
बचपन की कोमल आँखों में,
जो लोरी गाकर निद्रा भर दे,
वो माता और पिता ही है ।।

अपने कंधों पर उठा-बिठा,
अपनी गोदी में लिटा-पिटा ।
अपने बच्चों के हर दुख को,
जो हरकर नई खुशी भर दे,
वो माता और पिता ही है ।।

अपने सपनों को छोड़-तोड़,
और पाई-पाई को जोड़-जोड़।
बच्चों के सुन्दर भविष्य हेतु,
जो खुद को भी विक्रय कर दे,
वो माता और पिता ही है ।।

अपनी सेहत को मिटा-मिटा,
अपनी खुशियों से हटा-मिटा ।
उस बचपन के हठ के आगे,
जो मेहनत कई गुनी कर दे ,
वो माता और पिता ही है ।।

अंत समय भी सोच-सोच,
सिर के बालों को नोंच-नोंच।
बच्चों के सिर पर हाथ फिरा,
आयु का क्षण अर्पण कर दे,
वो माता और पिता ही है ।।
✍️  कुमार नवीन "गौरव"
_______________________________________
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिमी बंगाल
#विधा - स्वैच्छिक
#विषय ,- स्वैच्छिक

जैसे सूरज अधूरा होता है
उसके तेज के बिना

तारे अधूरे होते है
उसकी चमक, टीम टीम के बिना

पूर्णिमा अधूरी होती है
उसके चांदनी के बिना

उसी तरह मैं भी अधूरी हूं
मेरे बिना,मेरे सपनों के बिना

मत छीनो मुझको मुझ से ही तुम
मुझको मुझ में ही रहने दो तुम

✍️  जया वैष्णव ' अनंत '

_______________________________________
नमो साहित्य संगम संस्थान,प०बंगाल,
विषय -माटी का घर,
विधा - हाइकु,
नाम - गिरीश इन्द्र,
पता -श्री दुर्गा शक्ति पीठ, अजुवाॅ, आजमगढ़, ऊ ०प्र०-२७६१२७.
दि०-०१-११-२०२० ई ०

माटी का घर,
कितना अच्छा होता।
रह देख ले  ।।

कितना श्रम ?
ढोता , थकता जाता।
माटी का घर  ।।

माटी का घर,
यह तेरी काया है।
पहचान लेे ।।

माटी में ही है,
रमता परमेश्वर।
जगत बीच ।।

गर्व न कर ,
माटी की काया पर।
ईश - नियम ।।
०००
✍️ गिरीश  इन्द्र।
_______________________________________
नमन मंच

१-११-२०२०

विषय - स्वैच्छिक

विधा- दोहा

राम झरोखे बैठकर ,गाती मधुरम गीत।
बुला रही है आज फिर, हरिहर तुझको प्रीत।।


बैठी- बैठी बावरी, करती रोज विचार।
फूल बिछा दूंँ राह में, करूँ खूब सत्कार ।।।


तोड़ तोड़ कर बेर  को, रखती डाली रोज।
चुन- चुन कर नित ला रही,मीठे मीठे खोज।।


स्वयं मिलन को आ गए, लखन सहित रघुवीर।
शबरी गदगद हो गई, बहे नयन से नीर।।

✍️ विष्णु शर्मा "हरिहर"
कोटा राजस्थान

_______________________________________
नमन मंच
साहित्य संगम संस्थान बंगाल ईकाई
विषय _ स्वैच्छिक
शीर्षक _ भूख

भूख का दर्द वो क्या जाने
जो कभी भूखा नहीं सोया
भूख का मर्म वो क्या जाने
जो कभी भूख से तड़प कर
नहीं है रोया

पेट की अग्नि और इसकी तपिश
कोई भूखा ही जानता है
ऊँचे पत्थर के महलों में सोनेवाले
भूखे को नहीं कभी पहचानता है

पर्ण कुटी की टुटी खटिया में
कोई भूखा जब सोता है
तब उठती है क्रोध की ज्वाला
बच्चा जब भुखा रोता है

चिंगारी क्रांति की तब है उठती
बगावत का झंडा लहराता है
जब धधकती है भूख की ज्वाला
सामने वाला जल जाता है

दूध मलाई खाकर पड़ोसी
जब नींद की वंशी बजाता है
झोपड़ी में भुखे की फौज
तब बगावत का झंडा लहराता है

खाई पैदा हो जाती है  जग में
अमीरी और गरीबी का
जिसे पाट पाना है मुश्किल
इस दानव मंहगाई की

घृणा के भीड़ में जब जंग छिड़ जाता है
भयावह आकार ले लेता है
समाज बँट जाता है दो भगों में
नफरत की दीवार तब बन आता है

✍️ उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार

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#साहित्यसंगमसंस्थानपश्चिमीबंगाल
#विषय - स्वैच्छिक
विधा- कविता

"पहली करवा चौथ"
पहली करवा चौथ वो कर रही
जैसे फूलों की बगिया खिल रही
फैल रही प्यार की लालिमा
उसके सुंदर गालों पर
जैसे सूरज की लाली बिखर रही
उसके प्यार की महक से
हृदय की हर कली खिल रही
पहली करवा चौथ वो कर रही
उस प्यार के एहसास से ही
जो जोड़ रहा है दिल से दिल
दिल की हर धड़कन बस
उसका नाम अब ले रही
चांद में देखकर वो चेहरा
महोब्बत का रंग भर रही
पहली करवा चौथ वो कर रही
महोब्बत का रंग चढ़ रहा
उसके हृदय पर धीरे धीरे
वो भी खुद अब संवर रही
आईने को देखकर वो फिर
शर्म से निगाहें झुका रही
पहली करवा चौथ वो कर रही
महोब्बत और प्यार की निशानी
वो अपने हृदय में भर रही
हृदय में बसाकर महबूब का चेहरा
वो व्रत अपना खोल रही
पहली करवा चौथ वो कर रही

©®✍️  धीरज कुमार शुक्ला "दर्श"
झालावाड़ ,राजस्थान
_______________________________________

_______________________________________
मंच को मेरा सादर नमन 🙏
#साहित्यसंगमसंस्थान
पश्चिम बंगाल इकाई
विषय :-  स्वैक्षिक
विधा:-कविता
कविता का विषय :-"अन्तर्द्वन्द"

द्वंद?
क्या है ये द्वंद अन्तर्द्वन्द?
व्यथित हो जाता है मन
जब चलता है अन्तर्द्वन्द।

क्या है ये अन्तर्द्वन्द?
बहुत सोचा, समझना चाहा
पर समझ नहीं पाता
क्या है ये द्वंद अन्तर्द्वन्द?

चाहत और हकीकत के बीच
अनचाहा सा फासला?
मुक्कमल की तलाश में अधूरापन?
क्या यही है द्वंद अन्तर्द्वन्द?

समय का अनवरत,अविराम गुजरते जाना
कड़वी हकीकत।
पर चाहत.....?
काश ये लम्हा बहुत जाए
क्या यही है द्वंद अन्तर्द्वन्द?

आत्मा और मन का द्वंद
आत्मा निष्काम, पवित्र
मन ?
काम, क्रोध, मोह से परिपूर्ण।
आत्मा संसारिक बंधनों से मुक्त
मन -संसारिक मोह मृगतृष्णा में उलझकर अपने से अपनों से दूर।
आत्मा और मन का कभी ना ख़तम होने वाला मतभेद
क्या यही है द्वंद अन्तर्द्वन्द?

वक़्त से पहले
नसीब से ज्यादा
पाने की ख्वाहिश....
मृत्यु मोक्ष?
एक अटल अकाट्य सत्य।
फिर भी जीवन के प्रति
हर पल बढ़ता मोह
क्या यही है द्वंद अन्तर्द्वन्द?

व्यथित हो जाता हूं
जब चलता है अन्तर्द्वन्द
फिर भी समझ नहीं पाता
क्या यही है द्वंद अन्तर्द्वन्द.....?

        ✍️  वंदना सिंह
        कोलकाता
_______________________________________
#साहित्यसंगमसंस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय- स्वैच्छिक
#विधा- स्वैच्छिक
#दिनांक- 01/11/20, रविवार
मंच को नमन करते हुए आद. राजवीर सिंह मंत्र जी
व आद. कलावती कर्वा जी को सादर सम्प्रेषित-
              -----------०००---------
                        "नारी"
नारी तुम हो सुकोमल, जैसे फूल कोई कचनार
परहित चाहती  सर्वदा, खुद  कष्ट सहती अपार
खुद कष्ट सहती अपार, तेरी अजब रही कहानी
आंचल में है दूध तुम्हारे, पर क्यों आंखों में पानी

क्षण में पराई हो जावत, छोड़ बाबुल का घरबार
अनजाने  घर जाकर, अपना  बसा ले नव-संसार
अपना बसा ले नव-संसार, त्याग की मूरत है नारी
समाज में फिर भी, क्यों है  ताड़न की अधिकारी

नौ महीना गर्भ में घसीटे, वह कष्ट उठाती अपार
एक दिन आएगा लाल मेरा, सपने संजोती हजार
सपने संजोती हजार,जीवन न्यौछावर करती जाय
जब आती है वृद्धावस्था, वो क्यों देता है बिसराय

भांति-भांति के अत्याचार, तरह-तरह के होते वार
कई-कई लोग तो बेटियों को, गर्भ में ही देते हैं मार
गर्भ में ही देते हैं मार,कैसे चलेगी गृहस्थी की गाड़ी
जब ना बचेगी जन्मदात्री, कैसे आएगी घर में लाडी

यत्र-तत्र घूम रहे रावण, कोई कैसे दामन बचाय
आये-दिन ही बहन-बेटी की, इज्जत लुटती जाय
केवे 'राजस्थानी', बात ये  समझ में ही नहीं आय
नारी से ही उत्पन्न मानुष, क्यों नारी को ही सताय
------------------------------------------------------------
✍️ तुलसीराम 'राजस्थानी'
नावां सिटी (जिला नागौर) राज.
                   -------०००------
_______________________________________
साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
विषय-चाँद
विधा-स्वतंत्र
दिनांक-1/11/2020

सुन ऐ चाँद !ले चल न मुझे
अब इस जहाँ से ...
कि दिल की बातें यहाँ
कोई करता नहीं है ।

रुसवाई, बेवफाई हर तरफ़
सितारों की दुनिया में
कोई चलता नहीं है।

हर तरफ धोखा ,बेज़ार ज़िंदगी
कि रूमानियत मिले जहाँ
मुझे रहना वहीं हैं।

सुन ऐ चाँद!ले चल मुझे
अब इस जहाँ से..
कि तेरे जैसा दोस्त
मुझे यहाँ मिलता नहीं है।

✍️  वर्तिका अग्रवाल
वाराणसी
उ.प्र.
_______________________________________
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
विषय:स्वैच्छिक (नारी)
विधा:स्वैच्छिक (कविता)
01/11/2020
शीर्षक: प्रश्न आखिर कब तक
नारी अबला है या सबला ?
यह प्रश्न आखिर कब तक
पूछ-पूछ समाज निज का ही
खोते रहेगा  सम्मान?
भूत हो  ,भविष्य हो  या हो वर्तमान
नारी अबला नहीं ,सबला है
रखना सदा यह ध्यान।।

नारी की सबलता तो
ध्रुवतारा-सा अटल सत्य है ।
नारी सृष्टि सृजन कर्ता ,
मत परखो उसकी शक्तियों को,
उसकी क्षमताओं को समझना है
तो पौरुष के मद में चूर पुरुषों से
पूछो धरा पर धारण हुए कैसे है?

हम सबका बोझ उठाने वाली
जीवनदायी पृथ्वी की शक्ति पर
क्या तुम प्रश्नचिन्ह लगाओगे?
प्रकृति की योगदानों को
क्या तुम भूल जाओगे?
नव माह मातृगर्भ के अत्यंत
सुरक्षित कवच-सा कहीं और कोई दूसरी
कवच गढ़ पाओगे?

नर-नारी के भेदभाव में
क्या सभ्य समाज सभ्य बन पाया है?
बेटों को उत्तम स्थान और कुलदीपक का मान देकर
क्या वृद्धाश्रम की संख्या घट पायी है?
बेटियों को परायाधन कहकर भेदभाव के बलिवेदी पर
जो दिन रात बलि चढ़ाया है,
क्या बेटियों के बिन मरणसय्या तक
एकपल भी सुखी जीवन किसी ने पायी है?

भूत हो  ,भविष्य हो  या हो वर्तमान
नारी अबला नहीं ,सबला है
रखना सदा यह ध्यान।।

✍️ स्वाति पाण्डेय 'भारती'
कोलकाता पश्चिम बंगाल
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई

_______________________________________
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई

विषय -स्वैच्छिक
विधा-स्वैच्छिक
शीर्षक -ये कैसी मजबूरी
01/11/2029 रविवार

🌹🌹 ये कैसी मजबूरी🌹🌹
ये कैसी मजबूरी,
इंसान से इंसान की दूरी।

ये मालिक ,ये कैसी तेरी रजा,
इंसान को, इंसान से किया जुदा।

कोई, मिलने को बेताब है,
तो कहीँ ,लग रही आग है।

आदमी ,आदमी से दूर हुआ,
रद्द काम काज ,और टूर हुआ।

अचानक कैसा, आ गया तूफान,
देख दुर्दशा, नही खुलती जुबान।

रखनी है सबको, दो गज दूरी,
मास्क पहनना भी है अब जरूरी।

हर चीज के , देखो बढ़े दाम,
है चिन्तित, हर देश की जान।

चहु ओर टूट गया देखो इंसान,
अब तो हो जा ,ईश्वर तू मेहरबान।।

01/11/2020
✍️  अन्जनी अग्रवाल 'ओजस्वी'
कानपुर उत्तर प्रदेश
_______________________________________
#नमन मंच
विषय  स्वैच्किक
विधा स्वैच्किक
रचना  कविता
शीर्षक  बचपन
दिनांक 01 11 2020
मत  छीनो बचपन बच्चे का
बचपन में ही जीने दो
मात  पिता की छाँव जो पाए
बालक  पन  में रहने दो
काष्ठ  लोह के खेल खिलोने
माटी  में भी खेलेगा
युबा हुआ जब खेल कूद कर
बचपन अपना जीलेगा
तोड़ा टाडी  जोड़ा जाडी
रंग बिरंगे खेलो का
फेका फाकी उछल कूद
बचपन मे  यु  खेलेगा
मत  छीनो  बचपन बच्चे का
बचपन  मे ही जीने दो

✍️ श्री कांत  तैलंग
लखनऊ
दिनांक  01 11 2020
_______________________________________
नमन मंच
दिनांक - 1/1/2020
विषय - स्वैच्छिक
शीर्षक -
     सुगंध
विधा - हाइकु

एक सुगंध
अपनी मातृभूमि
देशप्रेम की

सोंधी सुगंध
प्रकृति की फ़िजा में
है समाहित

ये पंचतत्व
प्राण वायु जीवन
आत्मा सुगंध।

✍️  भावना गौड़
ग्रेटर नोएडा(उत्तर प्रदेश)
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जय माँ शारदा
नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान
   पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय-#राष्ट्र निर्माण (स्वैच्छिक)
#विधा-#कविता (स्वैच्छिक)
दिनांक-1-11-2020
दिन-रविवार
 
      🙏🇮🇳राष्ट्र निर्माण 🇮🇳🙏

राष्ट्रहित सर्वोपरि,राष्ट्र सेवा महान,
सबके सहयोग से हो भारत निर्माण।
जाग्रति हो युवा शक्ति, करे सबका आव्हान,
देश बने प्रगतिशील,सबका मिलें योगदान।
शिक्षा पहुँचे हर घर में,शिक्षा का बढ़ाये मान,
राष्ट्र के विकास में, चाहिये सबको ज्ञान ।
शिक्षा से ही मिलेगा, सबको अपना सम्मान,
देश में जो पिछड़े है,करे उनको भी शिक्षा दान ।
संविधान करे सम्मान, अनुशासन रखे ज्ञान,
राष्ट्र के निर्माण में सदा, रखे कर्तव्य का ध्यान ।

कुसंसकार को मिटाये, नई तकनीक अपनाये,
कृषि, व्यापार बढ़ाये, राष्ट्र को खुशहाल बनाये ।
आये राष्ट्र निर्माण में, हम संकल्प निभाये,
जाति का भेदभाव नहीं, विकास को आगे बढाये ।
शहीदों की शहादत को, अपने यादों में सजाये,
आये सब मिलकर, हम नया भारत  बनाये ।

✍️  गौतम सिहं "अनजान "
पश्चिम मिदनापुर
पश्चिम बंगाल
_______________________________________

#नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान प.ब.
दिनांक-1/11/20
विषय-स्वपसन्द
शीर्षक-आंखे

खुदा की देन है आँखे
कुदरत का उपहार है आँखे
सभी के पास है आँखे
अंधेरे से बचाती है आँखे

जन्म लेते ही खुलती है
बिदा होते ही बंद हो जाती
दिलो से ये मिलाती है
नजर से ये गिराती है

सभी को नाच नचाती  है
खुशी से झूम उठती है
गमो में आँशु बहाती है
शरारत में ये माहिर है

मुहब्बत की दीवानी है
अजब इनकी कहानी है
छिपी ढेरो है तस्वीरे
ये रहती आईना बनकर

अनेको रङ्ग बदलती है
बताती अजब परिभाषा
नीद में भी जगा करती
अनेको ख्वाब दिखाती है

✍️  मीना तिवारी
पुणे
_______________________________________
जय माँ शारदे
नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय -स्वैच्छिक
#विधा -पद्य
************

मैं हीं हूं कश्मीरी पंडित, मुझको क्या पहचाना |
बीच रात में मान बचाने,था घर छूटे जाना||

मेरे जो दुखी जीवन पर, बनते सहर फंसाने |
तिल तिल मरता हूं देखो , पीड़ा कोई ना जाने||
मैं हीं हूँ कश्मीरी पंडित,मुझको क्या पहचाना |
बीच रात में मान बचाने, था घर छूटे जाना||

दशक बड़ा जो दंगों का था , रात बड़ी थी काली |
जारी कर फरमान भगाए, समझे वो हमें मवाली||
मैं हीं हूं कश्मीरी पंडित, मुझको क्या पहचाना  |
बीच रात में मान बचाने, था घर छूटे जाना||

आई कितनी हीं सरकारें, बदली  कितनी सत्ता |
राज काज नीति व्यवस्था, कौड़ी कौड़ी बिकता ||
मैं हीं हूं कश्मीरी पंडित, मुझको क्या पहचाना|
बीच रात में मान बचाने , था घर छूटे जाना ||

✍️  स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता)

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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल
विषय-स्वैच्छिक
विधा-कविता
दिनांक-०१-११-२०

१७वीं शताब्दी अविष्कार अखबार देखिये।
उधोगपति का विचार अखबार देखिये।
देश विदेश की खबर अखबार देखिये।
हत्या लूट बलात्कार अखबार देखिये।
जनता की आवाज़ हत्या डकैती लूट।
कैसा है चुनावी लहर अखबार देखिये।
घटी घटनाएं, घटी वारदातें सभी।क्या कर रहे है पत्रकार अखबार देखिये।।
झूठ साच की खबरों का जान अखबार।
लूट लिये गये रहवर अखबार देखिये।
तटस्थ रहे नहीं देश के पत्रकार  है।
छप रही खबर आधार अखबार देखिये।।

पहुंच जाती सुबह सुबह नास्ते के साथ।
हिरो हिरोइन का अधर अखबार देखिये।
खेल के मैदान में क्या हो रहा है।
जीत गया वो हार अखबार देखिये।
नौकरी का विज्ञापन भरने का सुझाव।
कितने भरे बेरोजगार अखबार देखिये।
कुर्बान हुई दुल्हन दहेज के खातिर।
ढ़ायी गयीं कैसै कहर अखबार देखिये।
कुर्सी के लोभी ये नेता देश के।
क्या कर रहे है सुधार अखबार देखिये।

✍️  चन्द्र भूषण निर्भय
बेतिया
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नमन मंच🙏🙏🙏
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
तिथि - 01.11.2020
दिन - रविवार
विषय - मन
✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️✍️

व्याकुल हो जब मन मेरा,
मां को करता याद।
करके मां को याद मैं,
हो जाता खुशहाल।
हे माता! हो जाता खुशहाल।

मन में मेरी मां बसीं,
करता हर पल याद।
मां के ही आशीष से,
मैं रहता खुशहाल।
हे माता! मैं रहता खुशहाल।

कालजई है मां मेरी मेरी,
मेरी मां आबाद।
मेरी मां के तेज से,
मैं रहता खुशहाल।
हे माता! मैं रहता खुशहाल।

आंखों में आंसू लिए,
करता बचपन याद।
मेरी मां मुझको सदा,
रखती थी खुशहाल।
हे माता! रखती थी खुशहाल।

नमन आपको मां मेरी,
नमन है शत-शत बार।
मां के तेज प्रताप से,
सब रहते खुशहाल।
हे माता! सब रहते खुशहाल।

✍️रचनाकार - बुद्धि सागर गौतम,
गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत - 273016.

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#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
#शब्द_शोध

शब्द में आनंद है तो, शब्द में ही क्रोध हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध हैं

शब्द यदि टकरार है तो, प्रेम का प्रतिमान भी
शब्द से सम्मान है तो, शब्द से अपमान भी
शब्द घातक शूल है तो, शब्द से ही शोथ हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध हैं

शब्द यदि गाली बनी तो, शब्द गीता काव्य भी
शब्द यदि है साधना तो, शब्द से ही साध्य भी
शब्द यदि उत्थान है तो, शब्द ही प्रतिरोध हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध हैं

शब्द दैविक सम्पदा है, शब्द सुख का सार हैं
शब्द से जीवन सजा है, शब्द तो उपहार हैं
शब्द मीठे आप बोलो, आप से अनुरोध हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध है

शब्द यदि ओंकार है तो, शब्द ब्रम्ह गणेश हैं
शब्द यदि अवहेलना तो, शब्द ही उपदेश हैं
शब्द दुखदायी बने तो, शब्द ही आमोद हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध है

  ■अभिनव मिश्र"अदम्य"

शब्द में आनंद है तो, शब्द में ही क्रोध हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध हैं

शब्द यदि टकरार है तो, प्रेम का प्रतिमान भी
शब्द से सम्मान है तो, शब्द से अपमान भी
शब्द घातक शूल है तो, शब्द से ही शोथ हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध हैं

शब्द यदि गाली बनी तो, शब्द गीता काव्य भी
शब्द यदि है साधना तो, शब्द से ही साध्य भी
शब्द यदि उत्थान है तो, शब्द ही प्रतिरोध हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध हैं

शब्द दैविक सम्पदा है, शब्द सुख का सार हैं
शब्द से जीवन सजा है, शब्द तो उपहार हैं
शब्द मीठे आप बोलो, आप से अनुरोध हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध है

शब्द यदि ओंकार है तो, शब्द ब्रम्ह गणेश हैं
शब्द यदि अवहेलना तो, शब्द ही उपदेश हैं
शब्द दुखदायी बने तो, शब्द ही आमोद हैं
शब्द है अज्ञानता तो, शब्द में ही बोध है

  ✍️*■अभिनव मिश्र"अदम्य"*
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नमन मंच
# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
तिथि_ 01.11.2020
दिन- रविवार
विषय- मां। (गीत)

खुदा से मांग हमको इस दुनिया में जो लाये।
ऐसा कोई जादू मां तू ही तो कर पाये ।।
खुदा से......

नन्हें से मेरे कदम जो चलने में डगमगाये ।
थाम कर तू उंगली मुझे मंजिल तक पहुचाये ।।
बीच राह में जो कभी धोखा न दे जाये
ऐसा कोई........
खुदा से......

अश्को से कभी जो मेरी आंखें नम हो जाये ।
पास में बुलाके मुझे सीने से लगाये ।।
अश्क मेरे सारे तेरे आंचल में छुप जाये
ऐसा कोई जादू........
खुदा से.....

जीवन के सफर में जब थी मैं अकेली ‌।
तू चुपके से आकर के बन गयी मेरी सहेली ।।
ग़म सारे लेकर भी जो बस खुशियां ही दे जाये
ऐसा कोई....
खुदा से....

👉 दिप्ती गुप्ता
👉संदना, सीतापुर
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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विधा _ कविता
#शीर्षक _ कब तक

व्यथित हृदय से धधक रही अंतर्मन की ज्वालाएं
कब तक भूखे भेड़ियों का शिकार बनेगी बेटियां ये
अश्क भरे नयनों से कब तक मदद की पुकार करेगी
मौन धारण करके कब तक जीवन में विषपान करेगी
डर के साये में कब तक जीवन अपना बसर करेगी
हैवानों से डरकर कब तक चारदीवारी में बन्द रहेगी
आखिर कब तक दहशत के साए में बेटियां रहेगी
अन्याय, अत्याचार को चुप्पी साध सहती रहेगी
अधरों को सील कर कब तक यूं ही बैठी रहेगी
आखिर कब तक गली, चौराहे पर दरिंदे घूमते रहेंगे
अपराध करके भी यूं स्वच्छंद विचरण करते रहेंगे
कब तक नाजुक कलियों को पैरों तले कुचलते रहेंगे
ना केवल तन को बल्कि रूह को भी लहूलुहान करेंगे
आखिर कब तक वहशीपन का खेल खेलते रहेंगे
पुरुषत्व को कब तक यूं ही शर्मसार करते रहेंगे
बेटियां कब तक दुष्टों की पीड़ा का दंश सहेगी
आखिर कब तक बेटियां यूं ही निर्भया बनती रहेगी
रैलियां कब तक निकलेगी,मोमबत्तियां कब तक जलेगी
आखिर कब तक बेटियां अखबार की सुर्खियां बनेगी
दुष्कर्मियों को दंड दो यही पुकार करती रहेगी
दर दर भटककर कब तक न्याय की गुहार करेगी
नहीं है कमजोर फिर भी कब तक अबला बनेगी
आखिर कब तक देश में बेटियां असुरक्षित रहेगी
सरकार यूं ही कब तक लाचार, बेबस, मौन रहेगी
तेजाब, दहेज,बलात्कार की बेटियां शिकार होगी
बेटी को जन्म देने से कब तक हर मां डरती रहेगी
आखिर कब तक बेटियां यूं ही निर्भया बनती रहेगी।

✍️ प्रेमलता चौधरी
फालना, पाली राजस्थान
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नमन मंच
#साहित्यसंगमसंस्थानपश्चिमबंगाल
विधा - कविता
दिनांक-01.11.2020
********************
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     शीर्षक- माता-पिता ही भगवान है।

ढूंढ रहे हो मंदिर , मस्जिद और गुरूद्वारे में ,
वहां तो सिर्फ श्रद्धा का वास  है ।

मत ढूंढो कही प्रभु का वास ,
घर जाकर पुछो उनका हालचाल जो बैठे हैं तेरे आश में।
क्योंकि माता-पिता ही भगवान है।

भूख लगे तो चलें जाना कभी मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे,
बिन मांगे कोई एक तिनका तक नहीं देगा ‌।
वहीं भूख में तुम मुस्कुराते हुए घर में घुस जाना,
तेरी मुस्कुराहट में तेरे भूख को पहचान लेगा।
क्योंकि माता-पिता ही भगवान है।

कभी किसी चीज की जरूरत पड़ी तो ,
मांग लेना मंदिर,मस्जिद, गुरुद्वारे में
जाकर।
खुद मांगकर मेहनत खुद से करना पड़ेगा।

बिन कहे ही वो  तेरे छोटी बड़ी जरूरत को पहचान लेता हैं।
अपनी जरूरत को छोड़कर ,
वो तेरे जरूरत को पूरा कर देता है।
क्योंकि माता-पिता ही भगवान है।

मंदिर मस्जिद और गुरूद्वारे सिर्फ श्रद्धा का वास है।
क्योंकि माता-पिता ही भगवान है।
*******

✍️ प्रहलाद मंडल
कसवा गोड्डा ,गोड्डा ,झारखंड

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नमन मंच🙏🙏
# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
# विषय- स्वैच्छिक (प्रेम)
# विधा-कविता

महफ़िल में जो तुम हौले से
मेरे काँधे पर हाथ रखते हो
मेरे लिए नया कुछ नही
लोगों की नज़र में आ जाते हो

तारीफ़ होती है कि तुम यूहीं
हौसला बनाए रखते हो
खबर फैल जाती है कि तुम
मेरा कितना ख्याल रखते हो

जो हौले से तुम मेरे
हाथ से हाथ टकराते हो
वो पहली छुअन मुझे
आज भी याद दिलाते हो

सरकते पल्लू को यूँ संभाल
देते हो
कि जैसे मेरी घबङाहट भांप
लेते हो

आंखों में ताककर यूँ खो
जाते हो
कि जैसे महफ़िल है बेगानी
और तुम बस हमारे हो

मेरे होठों को यूँ पढ़ लेते हो
जैसे गज़ल कोई सुनाने वाले
हो

✍️ प्रियंका प्रियदर्शिनी
फरीदाबाद हरियाणा
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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल ईकाई नमनमंच
#दिन रविवार
#दिनांक 01/11/2020
#विषय स्वैच्छिक
#विधास्वैच्छिक




कविता शरद पूर्णिमा का चांद

चांद की चांदनी,
शरद की बहार
शरद पूर्णिमा का चांद
सोलह कलाओं का पूंज़
सुन्दरतम,
दूधमलाई ज़ैसा

शरद पूर्णिमा की चांदनी
शरद ऋतु की बहार
श्री कृष्ण ने रास रचाया था।
गोपियों को दिल में बसाया था।

शरद पूर्णिमा की चांदनी,
शरद ऋतु की बहार
शायरों की शायरी
गज़लों की गज़ल कवियों
की कविता बन ज़ाती है,
घर आंगन को सज़ाती है,
सारा आकाश को ज़गमगाती ,
मुरझाये मन को गुदगुदाती है।
शरद पूर्णिमा का चांद,
चांदी ज़ैसा चमचम
मनभावन लगता है।
शरद पूर्णिमा की चांदनी
धरा पर बरसती है
चकोर चकित
हाथी मदमस्त
हो ज़ाता है।
शरद पूर्णिमा की चांदनी
शरद की बहार
चांदी से चिपक ज़ाऊं,
बात करूं,
हरी घास पर बैठ कर
शरद गीतगाउं।
शरद पूर्णिमा की चांदनी
से श्वास रोगों का होता है उपचार
अनेक रोगों का होता है संहार

✍️ दिलीप कुमार झा
फोर्ट ग्लास टर विद्यालय हाबड़ा पश्चिम बंगाल

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#नमन मञ्च🙏🙏🙏
#साहित्यसङ्गमसंस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
विषय- #स्वैच्छिक
विधा- #तुक्तककथा
दिनाँक- 01-11-202रविवार
💐💐💐💐💐💐
🌻सुनो बटोही🌻💐
💐💐💐💐💐💐
भ्रष्टाचार
चारों खाने
चित्त है✍️
क्योंकि
भ्रष्टाचार
उन्मूलन
प्रकोष्ठ के
सदस्य ही
इसमें संलिप्त हैं

✍️🙏श्रीरामसाहू"#अकेला"

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नमन मंच
साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल ईकाई
विषय- बेटियाँ
विधा- कविता
स्वैच्छिक
दिनाँक 01-11-2020
                   शीर्षक-बेटियाँ
बेटियाँ शिक्षा संस्कार हैं,
बेटियाँ चाँद सितारे है।
बेटियाँ ऊँची मीनार है,
बेटियाँ आँखो के तारे है।।
बेटियाँ भोर के सूर्य हैं,
बेटियाँ शांम के लाली है।
बेटियाँ मुस्कराते फूल हैं ,
बेटियाँ दुर्गे और काली है।।
बेटियाँ पिता के दुलार है,
बेटियाँ घर के दीवार है।
बेटियाँ भाईयो के प्यार है,
बेटियाँ दुश्मनों के तलवार हैं।।
पावन दुवायें हैं बेटियाँ,
पुराणों में नारी है बेटियाँ।
जातक कथायें है बेटियाँ,
अमृत वाणी हैं बेटियाँ।।
बाधाओं को दूर करते हैं,
रूप है भगवान की।
स्वच्छ तन पवित्र मन,
बेटियाँ होती है सम्मान की।।
                   
             ✍️    देबीदीन चन्द़वँशी
                   ग्राम- बेलगवाँ
                     तह0 पुष्पराजगढ़
                       जिला अनूपपुर
                              म0प्र0
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नमन मचं
#साहित्य _संगम_संस्थान पश्चिम बंगाल
विधा कविता
विषय #शरदपूर्णिमा
दिनांक 01/11/2020
**************************************
उज्जवल उजास लिए शरद चाॅ॑द निकला देखो मेरे आंगन में।
धवल चाॅ॑दनी फैलाना तुम मेरे जीवन की दामन में।।

पिया मिलन की आस लिए ताकती खड़ी अटरिया पर।
शरद चाॅ॑द संग में लाना पिया की खबरिया घर।।

तिमिर यामिनी का आंचल मंद मंद मुस्काता है।
शीतल मंद बयार संग में मेरे उर को तरसाता है।।

चारु चंद्र उज्जवल उजास शरद पूर्णिमा को लाता है।
अमिय की रसधार धरा पर पल पल वो बरसाता है।।

हरसिंगार की मादकता उस पल तन-मन को महक आती है।
शरद चाॅ॑द को गले लगाने पल पल वो हर्षाती है।।

धरा पर दमकती  निहारिका और व्योम पर तारे हैं।
शरद रात के चाॅ॑द को निहारते जग में सारे है।।

निर्झरिणी भी उज्जवल उजास आंचल में समेटे हैं
प्रीत की ईप्सा में गोरी चाॅ॑दनी को लपेट है।।

शरद चाॅ॑दनी से खेल श्याम महा रास को रचाते हैं।
गोपियों के संग मधुवन को रासलीला से सजाते हैं।।

शरद पूर्णिमा स्वर्ण कलश भर अमृत को बूंद बूंद टपकाती हैं
खीर में शरद चाॅ॑द हर क्षण अमृतरस मिलाती है।।

प्रेमी की प्रेयसी चौदहवीं का चाॅ॑द या पूनम का चाॅ॑द हो जाती है।
शरद चाॅ॑द से अठखेलियां कर तन मन को सजाती है।।

             ✍️ विनीता कुशवाहा
                गोंडा
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साहित्य संगम संथन
#पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक 01-10-2020
विषय स्वैच्छिक

समर का बिगुल बज चुका है
युद्ध तो करना होगा
अपने ही अंतर्द्वंदों से
पार्थ तुम्हें लड़ना होगा
आत्मसम्मान की रक्षा हेतु
शस्त्र तो उठाना होगा
अपने विजय रथ को
युद्ध भूमि की ओर बढ़ाना होगा
तोड़ना होगा हर चक्रव्यूह
दुश्मन का सर झुकाना होगा
अपनी वीरता और शौर्य  शक्ति का
पताका भी फहराना होगा
अदम्य साहस,सूझबूझ से
दृढ़ निश्चय करना होगा
आर पार की लड़ाई का
पथ प्रशस्त करना होगा

✍️  रजनी हरीश
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नमन 🙏 :- साहित्य संगम संस्थान, पश्चिम बंगाल इकाई
तिथि :- 01/11/2020
दिवस :-  रविवार
विषय :- स्वैच्छिक
विधा :-  स्वैच्छिक
प्रदाता :- आ. राजवीर सिंह मंत्र जी
विषय प्रवर्तक :-  आ. कलावती कर्वा जी

भरी मुसीबत में भी मुस्कुराता हूँ ,
हर एक दिन कुछ न कुछ नया सीख जाता हूँ ।।
फिर अपने में वह बदलाव लाता हूँ ,
शहर में ही बस गये ,
कभी काल अपना गांव जाता हूँ ।।

बीती पल को मैं न दोहराता हूँ ,
यदि दोहराता भी हूँ ,
तो उस दोहराये हुए पल से
एक कविता बनाता हूँ ।।
तब यूं ही ग़म में
भी मुस्कुराता हूँ ,
याद है , हर एक बात ,
कौन कहा मैं भूल जाता हूँ  ।।

✍️       रोशन कुमार झा
सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज, कोलकाता
ग्राम :- झोंझी , मधुबनी , बिहार,
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नमन मंच
# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
# विषय - स्वैच्छिक
# विधा - स्वैच्छिक
# दिनाँक - 01.11 2020

खोलो बन्धन आज दीप जलाओ।
फैला अंधियारा मन का ,दूर भगाओ।

जो बह रही हैं प्रतिद्वंद्वी हवाएं,
ढक न जाएं जिससे सभी दिशाएं।
कवि तुम नया संदेश सुनाओ,
फैला अंधेरा मन का दूर भगाओ।।

कल्पना साकार हो,विजयी कण कण,
नव शक्ति संचार ,उत्साह नूतन।
चुन चुन आशा किरण,तुम आ जाओ,
फैला अंधेरा मन का,दूर भगाओ।।

तुम्हारे बाजुओं में, अतुल बल है,
प्रगतिपूर्ण इरादा अटल है।
सूरज बनो दुनिया को जगाओ,
फैला अंधेरा मन का ,दूर भगाओ ।।

****✍️ ए. के.तिवारी , होशंगाबाद
      मध्यप्रदेश
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#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
#विषय_स्वैच्छिक
#विधा_स्वैच्छिक
#दिनांक_01_11_2020

गीत:-- मां

मां की परिभाषा संसार।
ममता ईश्वर का आकार।

मां करती जीवन साकार।
बिन तेरे यह जग बेकार।
मां ईश्वर का अहसास,
जन्नत होता मां का प्यार।
मां---------------------

मां बिन प्रभु भी लाचार।
चुकता नहीं मां का उपकार।
मां खुश होती है,
जग में जीवन अपना वार।
मां-----------------------

मां अनगिनत तेरे प्रकार।
तूं ही दुनिया की सरकार।
भिन्न नहीं ईश्वर से मां,
बनता नहीं बिन मां संसार।
मां----------------------

संतान में मां होती संस्कार।
मां ही जग की तारनहार।
प्रकृति संवारने में होती,
ईश्वर को मां की दरकार।

मां की परिभाषा संसार।
मां ईश्वर का आकार।

✍️ डॉ. भगवान सहाय मीना
बाड़ा पदमपुरा, जयपुर, राजस्थान
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🙏नमन मंच🙏
#साहित्य_संगम_संस्थान #पश्चिम_बंगाल_इकाई
दिनांक-01.11.2020
#विषय-स्वैच्छिक
#विधा-स्वैच्छिक
#शीर्षक :-ऐसा उपकार करें।
(पर्यावरण संरक्षण पर आधारित कविता रचना)

ऐसा उपकार करें।
---------------------------
हो दृढ़ संकल्पित हम सब,
अब राष्ट्र हित में वंदनवार करें।।.....

आओ आज प्रतिज्ञा लें,
जगहित में कुछ नेक काम करें।
हरी भरी हो धरती माता,
पर्यावरण मेंं ऐसा उपकार करें।

निज स्वार्थ के हो वशीभूत,
प्रकृति का गहरा ह्रास किया।
मानों
शिशु जन्मदात्री का कर दुग्धपान,
उसी को पाद प्रहारों से आघात किया।
हो ऐसा असभ्य काज नहीं,
जग कपूत कहकर नाम धरें।
हो दृढ़ संकल्पित हम सब,
अब राष्ट्र हित में वंदनवार करें।।.....

हरी भरी हो धरती अपनी
हरयाली हो चहुंओर भरपूर,
जनम,मरण-परण के अवसर पर वृक्षारोपण रिवाज फैलाएँ दूर दूर।
आओं ऐसा समाज-प्रकृति का अजोड़ ताना-बाना बुन धरें।
हो दृढ़ संकल्पित हम सब
अब राष्ट्र हित में वंदनवार करें।

दुनिया में नयी नयी बीमारियों का फैला कहर है।
ग्लोबल वार्मिंग, वन कटाई से प्रदूषण रूपी फैला जहर है।
दूषित धरणी पर पुनः सुनहरे समय का इजहार करें।
हो दृढसंकल्पित हम सब
अब राष्ट्र हित में वंदनवार करें।।

सुनामी, बाढ़,सूखा, अतिवृष्टि या अनावृष्टि के दुष्परिणामों से लड़ना है।
अणु-परमाणु ,अस्त्र-शस्त्रों की बजाय,
हरितक्रांति में सहयोग करना है।
कहीं नव पीढ़ी हमें विध्वंसकारी रूप में ना याद करें।
हो दृढसंकल्पित हम सब
अब राष्ट्र हित में वंदनवार करें।।

✍️ महेन्द्र सिंह 'कटारिया'
गुहाला, सीकर (राजस्थान)

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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक - 01-11-2020
विषय - स्वैच्छिक
विधा- पद्य
शीर्षक - हे! पुष्प रूपी पुष्पा मेरी।
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हे! पुष्प रूपी पुष्पा मेरी।
मेरे दिल की धडकती
                 धड़कन हो तुम।
प्राणो से भी प्रिय प्रिया तुम
                मेरी जीवन संगिनी हो।
मेरी हर श्वासों में बसती
                तुम मेरी हर श्वास हो।
मैं साजन तु सजनी मेरी
               तुम मेरा विश्वास हो।
कलियों सी मुस्कान लिए तुम
               घर की महकती शान हो।
जब विपदा से घिर जाता हूँ 
              तब समाधान बन जाती हो।
जब मैं कभी रुठ जाता हूँ,
             तब मुझको तुम मना लेती हो।
मेरी हर दुःख दर्द की
             दवा तुम बन जाती हो।
हे! पुष्प रूपी पुष्पा मेरी 
             जन्मों जनम तेरा साथ मिले।
             हर जनम में तेरा प्यार मिले।

✍️  मोहन लाल मीणा (अध्यापक)
सेमारी, जिला- उदयपुर (राजस्थान)

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#साहित्यसंगमसंस्थान #पश्चिमबंगालइकाई
#दिनांक-1/11/2020
#विषय -एक पल की खुशी
#विद्या - स्वतंत्र

एक पल की खुशी के लिए, हम ना जाने क्या-क्या करते हैं,
कभी हंसते हैं ,कभी रोते है, पर खुशी को ढूंढते रहते हैं।
जीवन का हर एक पल ,यूं तो सुहाना होता है,
पर ना जाने क्यों हम , उस एक पल को ढूंढते रहते हैं।
एक पल की खुशी की , एक बात आज मै आपको बताती हूं,
मेरी छोटी बहना ,जब मेरे घर में आई थी,
वो पल इतना खुशियों भरा था, सारा घर नाचा झूमा था।
लक्ष्मी घर में जो आई थी, बांटी गई बधाई थी,
उसकी प्यारी किलकारी ने ,घर में खुशियां भर दी थी।
हम सब एक पल को खुशी से ,मदमस्त हुए से झूमे थे,
कि आज भी जब सोचती हूं ,तो खुशी से हंस पडती हूं।
सुनती हूं जब भ्रूण हत्या , तो मन में कसक सी उठती है,
ना जाने लड़की लड़के में ,ये फर्क लोग क्यों करते हैं।
  प्रश्न चिन्ह यह बहुत बड़ा ,ना जाने कब यह दूर होगा,
हम खुशनसीब हैं ,मेरे घर में बेटियों की पूजा की जाती है।
दुनिया वालो ,तुम भी कर देखो, इस एक पल की खुशी को जी कर देखो,
बेटियां जिस घर आती है ,उस घर को स्वर्ग बनाती है।
एक पल की खुशी के लिए ,वो अपना जीवन न्योछावर कर जाती है।।

✍️ रंजना बिनानी
गोलाघाट असम
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#नमन मंच
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल ।
#दिनांक -01/11/2020
#विषय- स्वैच्छिक
#विधा- स्वैच्छिक
#शीर्षक- गजानन महाराज

भाद्र शुक्ल की चतुर्दशी,
मनत है गणपति त्योहार।
सवारी जिनका मूषक डिंक
मोदक है उनका प्रिय आहार ।।

उमा सुत है प्रथम पूज्य,
कहलाते गजानन महाराज।
ऋद्धि सिद्धि संग पधार,
पूर्ण करो मेरे सब काज।

प्रिय मोदक संग चढ़े इन्हे,
दूर्वा, शमी और पुष्प लाल।
हे लंबोदर ! हे विध्न नाशक !
आए हरो मेरे सब काल।।

हे ऋद्धि, सिद्धि दायक,
हे एकदंत ! हे विनायक !
गणेश उत्सव को द्ववार पधारो
बनो सदा हमारे सहायक।।

बप्पा गणपति पूजा हेतु,
दस दिवस को आए ।
पुत्र शुभ लाभ संग पधार,
सारी खुशियां भर लाए।।

फूल, चंदन संग अक्षत, रोली,
हाथ जोड़ बप्पा हम करते वंदन।
हे गणाध्यक्ष!, हे मेरे शिवनंदन,
करो स्वीकार अब मेरा अभिनन्दन।।

✍️ अंकुर सिंह
चंदवक, जौनपुर

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#नमन_साहित्य_संगम_संस्थान
#विषय_प्रवर्तन
विषय-स्वैच्छिक
विधा-स्वैच्छिक
दिनाँक - 1/11 /2020
मन/कविता
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ना समझ पाये कोई,
मन की गति अपार,
मन का कहना माने,
निश्चित होती है हार।

मन होता है चंचल,
मन कभी बाल मान,
अच्छे कर्म करने से,
बढ़ जाता है सम्मान।

मन के आगे ना चले,
मन जब चलता चाल,
कब होती है बेइज्जती,
कब करवा दे बेहाल।

मन को काबू कर ले,
बन सकता जन संत,
मन दरिया भांति बहे,
एक दिन होगा अंत।
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✍️ होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका,कनीना-123027
जिला-महेंद्रगढ़,हरियाणा

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जय माँ शारदे
#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_प्रदेश_इकाई
#विषय_स्वेच्छिक

शीर्षक-जिंदगी

जिंदगी में जो मिला है उसे समझते है कम।
दुसरों की चमक-दमक देख,क्यों होता गम।
विलासिता को पाने,करते उल्टे पुल्टे काम।
किसी तरह पैसा आए,कमाना चाहते नाम।
सही क्या है,गलत क्या है,नहीं रखते ध्यान।
हर तरीके से,पूरा करना चाहते है अरमान।
नहीं सोचते,मजदूर भी तो जिंदगी जी रहे।
गरीब को दाल,रोटी मिले,मस्ती में जी रहे।
जवानी के जोश में,अपनी धुन में मतवाले।
बड़े-बड़े ख्वाब देखते,दौड़ते फिरते दीवाने।
ठोकर खाकर गिरते,होता सच्चाई से सामना।
समय रहते सम्भले,नहीं पड़ता है पछताना।
ऊंचे ख्वाब देखो तो जिन्दगी की कठिन डगर।
ख्वाब सीमित,जीना सरल,मन संतुष्ट हो अगर।

✍️ कलावती कर्वा
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🙏🏻🙏🏻
#साहित्यसंगमसंस्थानपश्चिमबंगालइकाई
दिनाँक - 01/11/2020 आदित्यवार
विषय - स्वैच्छिक
विधा - कहानी
शीर्षक - एक अनोखा रिश्ता
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         प्रिया और रानी दोनों पक्की सहेलियाँ है। दोनों एक ही स्कूल एक ही क्लास में हैं और दोनों का घर भी आस-पास है, जिसकारण स्कूल के साथ-साथ बाकी का भी अधिकतर समय दोनों का एक साथ ही गुजरता है।
        रानी और प्रिया एक ऐसे समाज मे रहती है, जो पुरूष प्रधान है। जहाँ स्त्री का कोई महत्व नहीं है, उसके जज़्बातों और इच्छाओं का तो कोई भी मोल नहीं। स्त्रियों को गाय-भैंस जानवर से ज्यादा नहीं आंका जाता। रानी और प्रिया ने हमेशा अपनी माँ, बहन, भाभी तथा अन्य अड़ोस-पड़ोस की स्त्रियों को घरेलू हिंसा का शिकार होते देखा था। मार खाना, शोषित होना तो उनकी दिनचर्या में शामिल था। रानी की माँ का देहांत भी शराबी पिता की मार से ही हुआ था। रानी और प्रिया को भी कितनी ही बार अपनी इच्छाओं का हनन करना पड़ता।
           वो दोनों ऐसे माहौल में नहीं रहना चाहती पर उनके पास और कोई अन्य मार्ग भी नहीं था। प्रिया पढ़ने में बहुत अच्छी थी। वह पढ़लिखकर अपनी स्थिति सुधारना चाहती थी। लेकिन रानी का मन पढ़ाई में नहीं लगता था।
            दोनों ने अपनी स्कूल की पढ़ाई पूरी की और कॉलेज में दाखिला लिया। कुछ ही समय के बाद बालिग होते ही उनकी शादी की चर्चाएं चलने लगी। रानी के पिता ने कॉलेज का तीसरा साल पूरा होने से पहले ही उसके हाथ पीले कर दिये। और प्रिया ने अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी होने के बाद दिल्ली की एक में जॉब के लिए आवेदन दे दिया, और उसे वो जॉब मिल भी गई। प्रिया के दिल्ली जाने पर भी पिता व भाई ने बहुत रोक लगाई लेकिन प्रिया इस माहौल से बस दूर जाना चाहती थी, उसे ऐसा मौका शायद ही मिलता। इसीलिए प्रिया ने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया और लड़-झगड़ कर दिल्ली चली गई।
             काफी समय बीत जाने के बाद एक दिन प्रिया की माँ ने फोन पर बताया कि रानी अस्पताल में भर्ती है। बेटी का जन्म होने के कारण उसके पति ने उसे मार-मारकर अधमरा कर दिया। हालत बहुत गम्भीर है। यह सुनते ही प्रिया के आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उसने फौरन ही टिकट कराया तो एक सप्ताह बाद का टिकट मिला। एक हफ्ते बाद वो गांव पहुँचकर रानी से मिली। दोनों बचपन की सहेलियाँ एक-दूसरे को देखकर फूट-फूटकर रोने लगी। रानी की हालत देखकर प्रिया ने फैसला किया कि वो रानी को और उनकी बेटी को अपने साथ ले जाएगी, लेकिन परिवार वाले नहीं मानेंगे इस डर से उन्होंने चोरी-छुपे ही भाग-जाने का निर्णय लिया। और उसी रात वो तीनों दिल्ली चले आए। प्रिया ने घर पर एक चिट्ठी छोड़ दी, जिसमें लिखा था कि मैं रानी और उसकी बेटी को अपने साथ ले जा रही हूँ और अब कभी वापस नहीं आऊंगी।
               कई साल बीत गए है। प्रिया, रानी और उसकी बेटी पिंकी तीनों साथ में रहते हैं। प्रिया  घर का खर्च चलती है, घर के बाहर के सारे काम निपटाती है। वहीं रानी अपनी बेटी का ख्याल रखती है और पूरे घर की जिम्मेदारी निभाती है। प्रिया ने शादी नहीं की और रानी ने भी दोबारा शादी नहीं की। दोनों के मन मे पुरुषों के प्रति नफरत घर कर गई है। वे आपस मे ही खुश हैं। दोनों की इच्छा बस पिंकी को अच्छे से शिक्षित कर के अपने पैरों पर खड़ा करने की है।
             समाज इनके रिश्ते को नहीं समझता, उन्हें लगता है कि वे समलिंगी है। पर लोग क्या जाने कि वो समान लिंग वाले इंसान से प्यार नहीं बल्कि विपरीत लिंग वाले इंसान से नफरत करती है। शायद ही कोई इनके इस अनोखे रिश्ते को समझ पाएगा।

✍️ सोनल ओमर
कानपुर, उत्तर प्रदेश

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नमन मंच
साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक -01.11.2020
विषय - स्वैच्छिक
विधा - कविता
शीर्षक -कलमकार

मैं कलमकार हूं...कलम से अपनी बस सच्चाई लिखता हूं।
मैं खूबी नहीं कमजोरी को भी लिखने की रखता ताकत
मैं बेबाकी से झूठ को हरदम बेपर्दा भी करता हूं।

मैं कलमकार हूं...कलम से अपनी नया सृजन नित करता हूं।
मन के भावों को मोती - से, शब्दों का रूप नया देकर
कोरे कागज़ पर कितने ही,नव गीत गजल में लिखता हूं।

मैं कलमकार हूं...क़लम को अपनी सच्ची ताकत लिखता हूं।
किसी भी कीमत पर मेरी ये,कलम नहीं है बिक सकती
इस कलम धार से समय की धारा को भी बदल मैं सकता हूं।

मैं कलमकार हूं...कलम से अपनी जोश नया एक भरता हूं।
शब्दों के जरिए लोगों का, बरसों से सोया ज़मीर जगा
जन जन में नई एक क्रांति का,आगाज़ सदा ही करता हूं।

मैं कलमकार हूं...कलम से अपनी नव इतिहास भी रचता हूं।
मैं वीर सपूतों के बलिदानों की गौरव गाथाएं लिख
इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर,नित अजर अमर भी करता हूं।

मैं कलमकार हूं...कलम से अपनी इस दुनिया से लड़ता हूं।
कभी शब्दों से ही फूल तो,अंगारे बरसाकर कभी कभी
लोगों के हक़ की खातिर मैं,उनकी आवाज भी बनता हूं।

मैं कलमकार हूं...कलम से अपनी आस यही एक रखता हूं।
ना बिकने की,ना छपने की कोई रखता मन में चाह कभी।
फिर आए एक बदलाव नया,बस इतनी चाह मैं रखता हूं।

मैं कलमकार हूं... क़लम से अपनी सच्चाई को लिखता हूं।
मैं कलमकार हूं... क़लम को ही बस अपनी ताक़त लिखता हूं।

✍️ पवन सोलंकी
सुमेरपुर,पाली,राजस्थान।
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नमन मंच 🙏🏻
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#दिनांक > 01/11/2020
#विषय > स्वैच्छिक
#शीर्षक > आजकल मैं मन का करती हूँ
——————————-

वो कहते है ना सुनो सबकी करो मन की,
वो आज वही कर रही है।
और ये सच भी है कि आज की बेटी
बेटों से कम नहीं रही है।
आज वो ज़माने से कहती है कि|,....

बोलने दो दूनिया वालों को उन्हें जो बोलना है,
मैं उनका भी कहा बड़े ही ध्यान से सुनती हूँ।
सही को गलत गलत को सही कहना रीत है,
दुनिया की फिर भी अविरल चलती रहती हूँ।

दोस्तों,आजकल मैं मेरे मन का करती हूँ।

मैं अब पहले जैसी कमज़ोर नहीं,सहनशीलता की
कई हदें पार की है मैंने,अपना दायित्व समझती हूँ।
अब पहले की तरह मांगती नहीं कुछ रब से ख़ुद ही
मन को समझा लेती हूँ और ख़ुश भी रहती हूँ

दोस्तों,आजकल मैं मेरे मन का करती हूँ।

भले ही हूँ मैं अकेली ज़माना कूछः भी कहें
आदत है ज़माने की मैं मर्यादा में रहती हूँ।
ख़्वाहिशो से ज़्यादा ज़िम्मेदारियों का बोझ है सर पे, इसलिये इन ख़्वाहिशो को मन में दबा लेती हूँ।

दोस्तों,आजकल मैं मेरे मन का करती है|
और हाँ अब मैं बदल भी गई हूँ|

✍️ सुधीर सोनी बाली ज़िला पाली राजस्थान

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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक - 01.11.2020
बिषय - स्वैच्छिक
विधा  -   स्वैच्छिक
          शीर्षक - अहंकार
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अहंकार का कोई घर-द्वार नहीं होता
अभिमानी का कोई दरबार नहीं होता
न ही  यह बिकता  किसी बाजार में
न  कोई  इसका  खरीदार  ही होता

       ऐसा गरूर न शिक्षालयों में सिखाया जाता
       न  देवालयों से  आशीर्वाद में  ही मिलता
       एक बार वरण  करता जो यह अहम्मन्यता
       तन-मन बस नशा सा मृत्युपर्यन्त रह जाता ।

शब्द  अहंभाव  बहुत  कुछ  कह देता
सुशोभित शीश की मती पहले हर लेता
दूजे को  मिथ्याभिमान की मदहोशी में
नीचा दिखाने की  सर्वत्र  जुगत करता ।

        बेबात फुफकारता नाग फण सा गुमान
        स्व को मारता अहंकार सुनो सब जन
        यह जहर पा घमण्डी कृशकाय का हश्र
        वैसा ही होता जैसा रावण कंस दुर्योधन ।
                        
                   ✍️     जय हिन्द सिंह 'हिन्द'

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#नमन_साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
#दिनांक- 01/11/2020
#दिन- रविवार
#विषय- रविवार
#विधा- पिरामिड

वो
प्यारा
दिन है
खुशनुमा
रविवार है
सभी के लिए
सभी घर रहते।

हैं
सभी
प्रसन्न
घर पर
तत्पर रहें
मिल कर रहें
ध्यान से काम करें।

है
यही
उत्तम
अच्छा दिन
रविवार है
कार्यालय बंद
सोमवार को खुले

✍️ रचनाकार - बुद्धि सागर गौतम,
पता - नौसढ़, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश, भारत।

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साहित्य संगम संस्थान
विषय प्रवर्तन
विषय गांधीवाद स्वैच्छिक
विधा कविता
दिनांक 1 नवंबर 2020

पहले  गांधी  की आंधी थी,
अब तो मंद बह रही बयार।
उग्रवाद   आतंक   के आगे
गांधीवाद  हो गया लाचार।।

काश  आज  गांधी जी होते,
देखते सर्वत्र आतंकी  ताज।
रावण अब सबको ललकारे,
नहीं दिखता कहीं  रामराज।।

हिंसा की हरपल होती जीत,
सत्य धर्म  की  दिखती हार।
उग्रवाद   आतंक   के  आगे,
गांधीवाद   हो गया लाचार।।

सर्वधर्म   के  इस  सराय में,
हिंसा    की  जड़े हुई गहरी।
सीमा मे तिलतिल जल रहा,
राष्ट्रवाद   का   हर    प्रहरी।

भाई  भाई    का   हर  नारा,
अब बहा  रहा  है  अश्रुधार।
उग्रवाद   आतंक   के  आगे,
गांधीवाद  हो  गया लाचार।।

गांधी   जी   के   तीनों बंदर,
हटा  लिए   हैं   निज   हाथ।
सत्य    अहिंसा    के   आगे ,
झुकता  नहीं   है  अब माथ।

संप्रदाय के   कुलिश वार से,
मानवता  हो रही  तार-तार।
उग्रवाद    आतंक   के आगे,
गांधीवाद  हो   गया लाचार।।

कई  नाम  धरे   उपनाम धरे,
कईयों  ने  धारी  गांधी टोपी।
हुआ  विग्रह  पर  माल्यार्पण,
पर गांधीवाद की हुईन कोपी।

एक  राष्ट्र   नायक   गुजराती,
अभी   भी  कर  रहा सत्कार।
उग्रवाद   आतंक  के    आगे,
गांधीवाद    दिखता  लाचार।।

✍️ रामप्रवेश पंडित मेदिनीनगर झारखंड

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1. आ.फूल चंद्र विश्वकर्मा
2. आ.दामोदर मिश्र बैरागी,
3. आ.अमित कुमार बिजनौरी
4. आ.मनोज कुमार पुरोहित
5. आ.राजीव भारती
6. आ.विनय कुमार बुद्ध
7. आ.चेतन दास वैष्णव
8. आ.स्वाति(सरू)जैसलमेरिया
9. आ.अभियंता प्रिंस कुमार
10. आ.बेलीराम कनस्वाल
11. आ.सुधीर श्रीवास्तव
12. आ.राजकुमार प्रतापगढ़िया
13. आ.बृजमोहन रणा ,कश्यप
14. आ.अभिलाषा "आभा"
15. आ.रूचिका राय
16. आ.शिवशंकर लोध राजपूत
17. आ.एम. एम. अंसारी
18. आ.प्रमोद #यादव
19. आ.आभा  सिंह
20. आ.अनामिका वैश्य आईना
21. आ.कुमार नवीन "गौरव"
22. आ.जया वैष्णव ' अनंत '
23. आ.गिरीश  इन्द्र
24. आ.विष्णु शर्मा "हरिहर"
25. आ.उदय किशोर साह
26. आ.धीरज कुमार शुक्ला
27. आ.वंदना सिंह
28. आ.तुलसीराम 'राजस्थानी'
29. आ.वर्तिका अग्रवाल
30. आ.स्वाति पाण्डेय 'भारती'
31. आ.अन्जनी अग्रवाल 'ओजस्वी
32. आ.श्री कांत  तैलंग
33. आ.भावना गौड़
34. आ.गौतम सिहं "अनजान "
35. आ.मीना तिवारी
36. आ.स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी
37. आ.चन्द्र भूषण निर्भय
38. आ.बुद्धि सागर गौतम
39. आ.अभिनव मिश्र"अदम्य
40. आ.दिप्ती गुप्ता
41. आ.प्रेमलता चौधरी
42. आ.प्रहलाद मंडल
43. आ.प्रियंका प्रियदर्शिनी
44. आ.दिलीप कुमार झा
45. आ.श्रीरामसाहू
46. आ.देबीदीन चन्द़वँशी
47. आ.विनीता कुशवाहा
48. आ.रजनी हरीश
49. आ. रोशन कुमार झा
50. आ.ए. के.तिवारी
51. आ.डॉ. भगवान सहाय मीना
52. आ.महेन्द्र सिंह 'कटारिया
53. आ.मोहन लाल मीणा
54. आ.रंजना बिनानी
55. आ.अंकुर सिंह
56. आ.होशियार सिंह यादव
57. आ.कलावती कर्वा
58. आ.सोनल ओमर
59. आ.पवन सोलंकी
60. आ.सुधीर सोनी बाली
61. आ.जय हिन्द सिंह 'हिन्द'
62. आ.बुद्धि सागर गौतम,
63. आ.रामप्रवेश पंडित

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