साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई दैनिक लेखन क्रमांक :- 5

साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दैनिक लेखन क्रमांक :- 5

दिनांक :- 30/10/2020
दिवस :- शुक्रवार
विषय :- कश्ती
विधा :- स्वैच्छिक
विषय प्रदाता :- आ. कुमार रोहित रोज़ जी
विषय प्रवर्तक :- आ. स्वाति पाण्डेय जी
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#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
#विषय_प्रवर्तन 
#शुक्रवार (30-10-2020)
#विषय # कश्ती
#विधा #स्वैच्छिक 
विषय प्रदाता :- आ. कुमार रोहित रोज़ जी
विषय प्रवर्तक :- आ. स्वाति पाण्डेय जी

नोट - अपनी रचना के साथ #हैशटैग #साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई का प्रयोग जरूर करें! और अपनी रचनाएँ #विषय_प्रवर्तन के #कमेंट_बॉक्स में ही प्रेषित करें! 

आज हमारे मंच पर 'साहित्य संगम संस्थान' में साहित्यकार 'कश्ती ' को अपनी लेखनी रूपी 'पतवार' लिए पूरी मस्ती से रचना करने वाले हैं। इतने छोटे से शब्द में  कितना जादू है ,यह रचनाओं से पता चल ही जाएगा। 

शीर्षक: कश्ती की मस्ती 
हम मस्ती से जीने वाले ,
गमों को ठोकर दे हटाते हैं।
उत्पाती समुद्री लहरों में ,
हम नन्हीं-कश्ती ले जाते हैं। 

काली रात के अंधियारी को हम ,
उत्साहित हृदय के किरणों से पीते हैं।
सूखे अधरों के मुस्कानों से हम,
वीरानगी को दीवानगी से जीते हैं।

नन्ही-सी कश्ती लेकर हम
अनंत सीमाओं को छूते-झूमते-गाते हैं। 
हम दुर्लभ भावनाओं के साखी
जलते दीप के मदमस्त बाती हैं।

गिरते-उठते लहरों को हम
सावन के झूला-सा लुफ्त उठाते हैं। 
प्रलय के बीच कश्ती की मस्ती में 
हम विजय ध्वज फहराते हैं।

मस्ताने, दीवाने सिर्फ़ हम जिन्दा ही नहीं 
हम तो जिन्दगी को भी जीना सिखाते हैं।
चिंगारियों में लिपट-लिपट हम
स्वयं हवन कुंडों को सजाते हैं। 

नन्ही कश्ती की मस्ती को हम
मस्ताने आखिर साँसों तक जीते हैं। 
यही नन्ही कश्तियाँ नयी बस्तियों तक
निराशाओं को मिटा आशा के दीप जलाते हैं। 

आपका अपनी
स्वाति पाण्डेय 'भारती'

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बचपन की अठखेलियाँ, रहते खुद में मस्त।
हम मन के सम्राट थे, राज काज में व्यस्त।।

कागज की कश्ती रही, करते खुद पर नाज।
जैसे मानो मिल गया, अकबर का सरताज।

रंग बिरंगी कश्तियाँ, चलने को तैयार।
ऊपर से बारीस की, हल्की सी बौछार।

रिम झिम थी बरसात जब, नाच उठा मन मोर।
सब मिल कर हम खेलते, करते बस्ती शौर।

सारी मस्ती भूल कर, कमा रहे हैं नॉट।
चाहत है मन में यही, आये बचपन लौट।

अब असली कश्ती मिली, घूम रहे संसार।
हमे आज भी है मगर, उस कश्ती से प्यार।

लेलो दौलत सब अभी, धरूँ राम के पाँव।
लौटा दो बचपन अभी, लौटा दो वह नाँव।




✍️  मनोज कुमार पुरोहित
अलीपुरद्वार, पश्चिम बंगाल
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#साहित्य संगम संस्थान बंगाल इकाई
विषय  -#कश्ती
३०/१०/२०२०
टूटी हुई कश्ती है
दूर किनारा है
नदिया है गहरी
उस पार जाना है
पतवार थाम मांझी
लहरों से टकराना है
टूटी हुई कश्ती को
लहरों से बचाना है
अगर कश्ती अपनी
हुई पार तो
मिलेगा किनारा
हमें भी यहाँ
नहीं हुई गर पार ये
बने ठिकाना
हमारा यहाँ
कश्ती है टूटी
पानी है गहरा
लहरों से टक्कर
लेना है अब
मांझी थाम पतवार
आगे तू बढ़
मिलेगा किनारा
यकीं है मुझे
करेंगे पार नदिया
टूटी कश्ती से ही
लहरों से होगी
टक्कर अगर
कश्ती को सम्हाल
पार करेंगे हर मुश्किल

✍️  धीरज कुमार शुक्ला "दर्श"
झालावाड़, राजस्थान



 

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नमो साहित्य संगम संस्थान,प० बंगाल,
विषय - कश्ती,
विधा - हाइकु ,
नाम - गिरीश इन्द्र,
पता - श्री दुर्गा शक्ति पीठ, अजुवाॅ, आजमगढ़, ऊ ०प्र०-२७६१२७.
दि०-३०-१०-२०२० ई ०.

राम का नाम,
जप कर लगा ले।
कश्ती को पार ।।

भवसागर,
पार करने हेतु।
राम की कश्ती।।

कश्ती उलझी,
भवसागर - बीच।
राम जप लेे ।।

जीवन - कश्ती ।
खेवनहार राम,
पुकारो नित।।

हरि - नाम हैं ,
कश्ती के पतवार।
स्मरण कर ।।
०००
✍️   गिरीश इन्द्र

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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
विषय -कश्ती

बचपन के वो सुनहरें दिन
भुलाए नही भुल पातें.

वो घुमड़ते बादल थे आते
रिमझिम रिमझिम
बरसतें जाते
पानी सचमुच खूब था पड़ता
तालाबो को पूरा भर देता

ले आते कागज चमकीला
रंग बिरंगा, नीला पीला
लाल गुलाबी या चटकीला
कागज की हम नावं बनाते
पानी में उसे चलाते
हमको ऐसा ही कुछ लगता
ज्यों चांद कश्ती में चलता
चांद देख हम मुस्कातें
खुद को उसके पास ही पाते

बचपन के वो सुनहरें दिन
भुलाए नही भुल पातें.

बचपन का वो भोलापन
किसी से नहीं रखते थे द्वेष।
छोटी छोटी बातो पर
थोडा सा करते थे क्लेश..
सच में वो ही
असली जीवन था
किसी से न राग लपेट।
याद कर उस बचपन को
निर्मल अश्रु स्वतः ही बहते

बचपन के वो सुनहरें दिन
भुलाए नही भूल पातें.

✍️   स्वाति"सरू"जैसलमेरिया
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#माँ_शारदे_को_नमन
#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
#सम्मानीय_मंच_सादर_नमन
#विषय_कश्ती
#विद्या_कविता

जीवन रूपी कश्ती भक्ति से हो भवसागर पार।
सच्चे मन से ध्यान लगाए प्रभु आए भक्त द्वार।

सच्चाई पथपर जो चलते सदा सत्कर्म करते।
बिन माँगे प्रभु करे इच्छा पूरी भंडार भर देते।

परोपकार भाव मन रख करे सदा निस्वार्थ सेवा।
उनकी कश्ती पार उतरे मिले सेवा का फल मेवा।

अपने लिए हर प्राणी जीते है औरों के लिए जिये।
मनुष्य जन्म मिला जीवन अपना सार्थक कर जाये।

अपनी चिंता छोड़ जो दीन दुखियों की फिक्र करते।
उनकी चिंता भगवन करते नैया खैवेया बन जाते।

द्रोपदी, मीरा, कुब्ज्या, नरसी करी प्रभु की भक्ति।
विपत्ति में प्रभु दौड़े आते जो मन रखते आसक्ति।

✍️  कलावती कर्वा
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#साहित्य संगम संस्थान प बंगाल इकाई
दिनांक ३०-१०-२०२०
विषय  कश्ती
विधा कविता

हे प्रभो जीवन की कश्ती कर दिया तेरे हवाले।
तूँ अगर चाहे डुबाए या इसे चाहे बचा ले।।

उठ रहीं ऊँची लहरियाँ डर रहा है मेरा मन।
संकटों से घिर गया हूँ भव बंधनों से छुड़ा ले।।

सुख और दुख की तरंगें रास्ता रोके खड़ी हैं।
कृपा इतना मुझ पे करना सत्य के पथ पर चला ले।।

थक गया हूँ चलते चलते मंजिलें भी दूर हैं।
भर गया संसार से मन पास तूँ अपने बुला ले।।

भँवर में जीवन की कश्ती खा रही हिचकोल मग में।
पार कर उस ओर ले चल अपने में मुझको मिला ले।।

✍️ फूल चंद्र विश्वकर्मा
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नमन मंच
दिनांक-30/10/2020
विषय -कश्ती
विधा-स्वतंत्र

कभी न कभी
ये दिल की कश्ती
साहिल से जा टकराएगी।
कभी न कभी
ये दिल की बेचैनी
ज़ुबाँ पर आ ही जाएगी।

जो होठों से ना कहे
निगाहें समझाएंगी।
और जो निगाहों के दरिया में
ना डूबे,
दिल की धड़कनें प्यार की कश्ती
चलाएंगी।

✍️ वर्तिका अग्रवाल
वाराणसी
उ.प्र.
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सादर नमन मंच
#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
#शुक्रवार 30/10/20
#विषय # कश्ती
#विधा #स्वैच्छिक
हे प्रभु!मंझधार में कश्ती मेरी  किनारा खोजती हूँ
हाँ मैं भी तेरे चरणों में जीने का सहारा खोजती हूँ
तुम मेरे जीवन के कश्ती के खेवनहार हो
तुम ही मेरा सब कुछ तुम ही सच्चा प्यार हो
मेरी सारी दुनिया तुमसे तुम ही मेरा जहान हो
मेरे जीवन का तुम उपहार तुम्हीं वरदान हो!!

कण-कण हर क्षण जीवन का अस्तित्व तुम्हीं से है
हे नाथ!तुम बिन ना जीवन सारे जीवन का सारत्व
तुम्हीं से है
जीवन की डोलती कश्ती से पार लगाते हो
जीवन को महकाते हो जग को तुम चमकाते हो
तुम अद्वितीय आराध्य तुम्हीं जीना सबको सीखलाते हो
तेरे खातिर ये मेरा सारा जीवन कुर्बान हो
हे प्रभु! मंझधार में कश्ती मेरी किनारा खोजती हूँ
हाँ मैं भी तेरे चरणों में जीने का सहारा खोजती हूँ!!

✍️ आभा सिंह लखनऊ उत्तर प्रदेश
#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
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नमन मंच
#साहित्यसंगमसंस्थानप0बंगाल
#दिनांक-30/10/2020
#दैनिक सृजन
#विधा--कविता
#विषय-- #कश्ती
मेरी कश्ती पार लगेगी
मुझको हे विश्वास
मेरी किस्मत ले जायेगी
पूर्ण प्रज्ञ के पास।।

मैं कर्म पथिक बस चलता हूँ
मुझे कहाँ आराम।
निशदिन ही मैं श्रम करता हूँ
फल देंगे श्री राम।।

बिन प्रयोजन कहाँ है जीवन?
मानव!कहाँ विश्राम?
माया  के  हैं   ये   सब  बंधन
जाने प्रभु घनश्याम।।

जब-जब संकट बदरी छाये
तू ही पालनहार।
तरणी डगमग  करती  जाये
तू ही खेवनहार।।

मै मूरख खलकामी मानव
तेरी कृपा अपार।
झंझावातों से कश्ती को
कर दो बेडा पार।।

श्रांत-क्लांत हूँ भवसागर में
नाव फँसी मझधार।
तुम आओ माझी तरणी में,
ले चल बस उस पार।।

✍️.  रोशन बलूनी
कोटद्वा पौडीगढवाल
      उत्तराखण्ड

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#सहित्यसंगमसंस्थान पश्चिम बंगाल
#विषय-कश्ती
#विधा-कविता

मेरे जीवन रूपी कश्ती के,
बनो तुम पतवार।
मेरी रूठी हुई किस्मत को,
लगा दो तुम पार।

तूफान है समुंदर में,
मैं फँसी हूँ मँझधार।
तुम ही खैवया हो,
कर दो मेरा बेड़ा पार।

नित कर्म में करती हूँ,
नही फल का है इंतजार,
तुझ पर छोड़ा है
मैंने जीवन की धार।

माया मोह में फँसकर,
नही मिलता किनारा है।
व्यथित हूँ मै हरदम,
प्रभु तुम बनो खेवनहार।

✍️  रूचिका राय
,सिवान बिहार

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#साहित्य संगम संस्थान,प० बंगाल,
#विषय - कश्ती
#विधा - कविता

मेरे बचपन के दिन, मैं भूल नहीं पाता ।
हरदम रहा मेरा तो, खेलों से ही नाता ।।

बादलों की रिमझिम, घुमड़ घुमड़ के बारिश ।
पथ में होती फिसलन,होती ऐसी बारिश ।।

तालाब भरते भरपूर,नदियां हैं उमड़ती।
हैं ऐसे में हमारी ,सुंदर भावना घुमड़ती।।

न तालाब गए हम,न नदियों में हम जाते ।
आंगन को भरकर घर में,हम कश्तियां चलाते ।।

रंग बिरंगे कागज , की कश्तियां बनाकर ।
खुश हो जाते हम तो,पानी में ही चलाकर ।।

जब डूब जाती कश्ती,हमको है रोना आता ।
पापा थे जब मानते , मैं नई कश्तियां बनाता ।।

न द्वेष था किसी से,न कोई होता क्लेश।
न मन में रहता कोई,भावना या विद्वेष।।

बचपन का भोलापन जो,यदि फिर से लो ट आए।
कोई भी होय दुख वो, हमको नहीं सताए ।।

अब आज ज़िन्दगी की,कश्ती भंवर में डोले ।
ईश्वर भरोसे नैया , हैं खा रही हिंडोले ।।

✍️  राजा बाबू दुबे
जबलपुर (म.प्र.)

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नमो साहित्य संगम संस्थान
प० बंगाल,
विषय-कश्ती
विधा-कविता

अडिग विश्वास  की कश्ती।
पर होकर हम, सब सवार ।।
जाने को ,जीवन नदी के पार।
सद्कर्मों को कर,हैं हम तैयार।।

रख दो हम पर, कृपा वरद हाथ।
पलट कर न करे, कोई हम पर वार।
ऐसा तो हमें हे प्रभु!  सदविचार।
लगा दो मेरी, जीवन  कश्ती पार।।

जब जब भंवर ने, मुझे घेरा।
तुमने ही आकर, डाला डेरा।।
उत्पादी समुन्द्रों की, लहरों में।
तेरी मर्जी पर, जीवन पतवार।।

अब तो मेरी कश्ती, तेरे हवाले।
कर दो पार ,ओ जीवन रखवाले।।
बुला लो अब तो, अपने दरवार।
कही डुबा न दे, लालच की  धार।।

✍️ अन्जनी अग्रवाल ओजस्वी

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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल मंच को नमन।
#दिनांक :  30 अक्टूबर 2020.
#दिन : शुक्रवार।
#विषय : कश्ती।
#विधा : पद्य।

                                ।रचना।

मेरी छोटी सी कश्ती है,
लहरें भी पूरे जोर पर हैं,
मेरी कश्ती फिर भी  क्यों,
तूफानों से लड़ना चाहती है?

करती है क्यों इंतजार यह,
लहरों और तूफानों की सदा,
क्या पता इसने खुद ही,
तूफानों से कोई वादा किया हो।

करती आसमान छू  लेने की,
जिद क्यों  यह हमेशा  ही,
मेरी छोटी सी  कश्ती है,
और  किनारा अभी दूर बहुत है।

बूंद से बादल बन सकती  है,
इंतजार है  इसे एक दरिया की,
जब समंदर में  जा मिलेगी,
तभी जाकर मेरी कश्ती रुकेगी।

लड़ कर गोताखोरों की तरह,
जब मेरी कश्ती  छोटी  सी,
तूफानों  में पूरी  घिर जाएगी,
कोई किनारा तो मिल ही जाएगा!

   ✍️  दामोदर मिश्र बैरागी,
     मेदिनीनगर पलामू झारखंड।

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नमन मंच
दिनांक 30/1012020
साहित्य संगम संस्थान बंगाल इकाई
विषय कश्ती
विधा स्वैच्छिक

कविता

हे प्रभु
तू है नैया
तू किनारा
तू कश्ती
तू ही खेवनहार
तेरे बिन
कोई नहीं
दाता हमारा
तू गुजारा
तू सहारा
मैंने तुझको पुकारा
पल पल तुझको निहारा
कण कण में
अंग अंग में
तेरे ही हैं पसारा
तूने रचा
जगत सारा

✍️  अमित कुमार बिजनौरी
स्योहारा बिजनौर उ०प्र०
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नमन मंच
# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल
विषय  - कश्ती
विधा - कविता
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जीवन की कश्ती को लेकर
नाविक चल मजधारों में ,
मंजिल तुझको नहीं मिलेगी
इन मदमस्त बहारों में |

संघर्ष पथ पर ही चलकर
मंजिल को पाना होता है ,
सब कुछ खोकर ही मानव
चांदी से सोना हो पाता है  |

मेहदी सा जब पिसता है
चंदन सा जब घिसता है |
झंझावातो से लड़ लड़कर
मधुवन सा फिर हंसता है |

जीवन की छोटी कश्ती लेकर
साहस को पतवार बनाता है ,
चीर उदधि के सीने को
राह सहज बनाता है  |

नाविक बनकर जीवन नौका को
लहरों से टकराता है |
लक्ष्य साधने को अर्जुन सा
साहस पर भरोसा पाता है |

हार जीत भय भीरूता से
जब परे हो जाता है ,
पथरीले राहों पर उसके
विजय फूल बरसाता है |

मानव जीवन कश्ती है
सबको खेनी पड़ती है ,
गर ताकत हो इन बांहों में
तूफानों पर भारी पड़ती है
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✍️  एम. एस. अंसारी (शिक्षक)
कोलकाता -24
पश्चिम बंगाल
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# साहित्य संगम संस्थान बंगाल इकाई ।
# दिनांक .30 .10 .2020 .
# वार .शुक्रवार ।
# विषय .कश्ती ।
# विधा .कविता ।
जीवन की कश्ती बिना ,भक्ति के पार नही होती ।
भक्ति बिना ईश्वर की ,प्राप्ति नही होती ।।
बिना नाविक कश्ती ,मझधार में डूब जाती ।
उसी प्रकार भवसागर की नैया ,भगवान बिना पर नही होती ।।
बिना श्रद्धा के ईश्वर के ,साक्षात्कार नही होते ।
बिना तपस्या के ईश्वर ,कभी नही रिझते ।।
सुकर्मो से ही परलोक ,की प्राप्ति होती ।
पाप कर्मो से नर्क ,की प्राप्ति ही होती ।।
मानव जीवन में ही ,ईश्वर की प्राप्ति हो सकती ।
वरना फिर चौरासी लाख ,योनियों में भटकना होता ही ।।
कुछ कर्म किया बिना ,कश्ती पार नही होती ।
परोपकार करने से ,जीवन नैया पार हो जाती ।।

✍️  बृजमोहन रणा ,कश्यप
,कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।
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#साहित्य संगम संस्थान
# पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक 30-10-2020
विषय कश्ती

राज़ गहरे हैं ज़िन्दगी के,
कोई मुझे जीना सिखाए।
ज़िन्दगी की ऊंची नीची राहों में,
कोई मुझे सहजता से चलना सिखाए।
सफलता की बात सभी करते है,
कोई असफलता का जहर भी,
कभी हंसकर पीना सिखाए।
धूप छांव तो आते है ज़िन्दगी में,
कोई बादल बन कर ,
उमंगों की बरसात कराए।
कमजोर पलों में थामे हाथ,
कोई धीरे धीरे थपथपाकर
  प्यार से पीठ  सहलाए ।
  अथाह सागर की एक कमजोर कश्ती को,
  मजबूत पतवार लगा कर,
  कोई  तो आगे बढ़ना सिखाए।

✍️ रजनी हरीश

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#नमनमंच
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल ।
#दिनांक-30/10/2020
#शीर्षक-कश्ती
#विधा- कविता

अथाह उदधि की जल राशि में,
                          मैं अनथक पतवार चलाऊंगा।
बाधाएं कितनी भी आएं,
                           मैं कश्ती पार लगाऊंगा। 

घोर विपत में चलूं अकेला,
                        दुनियां बस स्वारथ का मेला।
इस मेले में सच मानो तो,
                         चलना है इक बड़ा झमेला।
पर सपने जो देखे थे मैंने,
                         वो सच करके दिखलाऊंगा।
बाधाएं कितनी भी आएं।
                         मैं कश्ती पार लगाऊंगा।

कोई मुझको रोक न पाए,
                         चाहे काल भी सम्मुख आए।
तज दे भानू चाहे निज पथ को,
                         चाहे पवना भी थम जाए।
मैं अटल इरादे लिए ह्रदय में,
                          तूफान से भी टकराऊंगा।
बाधाएं कितनी भी आएं ,
                          मैं कश्ती पार लगाऊंगा ।।

********मैं नैया पार लगाऊंगा।।**********

✍️   बेलीराम कनस्वाल
घनसाली,टिहरी गढ़वाल,उतराखण्ड ।
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक 30 अक्टूबर 2020
दिन-शुक्रवार
#विषय- कश्ती
विधा- कविता
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कब छूट गया वो बारिश में नहाना
बहते पानी में कागज की कश्ती चलाना
आज जब देखता हूं बारिश की बूंदों को
याद आता है मुझे वो गुजरा हुआ जमाना।
वो नंगे पांव पानी में दौड़ लगाना
बूंदों संग जी भर खुशियां मनाना
कभी-कभी सोचता हूं
क्या बदल गई वो बारिश
या बदल गया वो मौसम पुराना
आखिर कहां गया वो खुशियों भरा जमाना।
जब कभी यादों के आईने में देखता हूं
तो दिखता है धुंधला- सा एक चेहरा पुराना
दिखता है किसी का मुझसे नजरें चुराना
और बिना कहे बहुत कुछ कह जाना।
अक्सर लोग कहते हैं अब हम बड़े हो गए
कागज की कश्ती और बारिश की बूंदों से परे हो गए
पर क्या सच में हम इतने बड़े हो गए
कि अपनी ही खुशियों से परे हो गए
कभी फुरसत मिले तो सोचना और मुझे बताना
क्या तुम्हें भी याद है वो कागज की कश्ती
और तुम्हारा बारिश में नहाना।
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✍️ सुनील कुमार
जिला- बहराइच,उत्तर प्रदेश।
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनाँक-30.10.2020
दिन-शुक्रवार
विषय-कश्ती
विधा-कविता

कश्ती
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मानो या न मानो
मगर कश्ती को पहचानो।
अपनी कश्ती की
पतवार से न खिलवाड़ करो
खुद के साथ
पतवार से भी प्यार करो।
क्योंकि पतवार बिन कश्ती
हिचखोले खाती रहेगी,
आपके हाथ से बेकाबू रहेगी।
अच्छा है अपने आराध्य का
हरपल ध्यान ,गुणगान करो,
अपने जीवन के कश्ती की पतवार
उसके चरणों में रख
हमेशा के लिये निश्चिंत रहो।

■ ✍️ सुधीर श्रीवास्तव
      गोण्डा(उ.प्र.)
    
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नमन मंच 🙏🏻🙏🏻
# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल
इकाई
# विषय - कश्ती
# विधा  - स्वैच्छिक (कविता )

धैर्य रूपी कश्ती
जीवन रूपी सागर
पार कर जाना है
बनकर खेवैया
जो तूफान की आशंका हो
थोड़ा दृढ़ हो जाना
हौसला न खोना
कश्ती को संभाले रखना
जो इरादा मजबूत हो
न डगमगाओगे
मिलता रहे संबल
कश्ती पार लगाओगे
पतवार की पकड़
रखो मजबूत
कश्ती सँभले
तभी हुजूर
भावों से कश्ती चलती
जिंदगी के हर रंग दिखाती
छू लो हर भाव को
निर्मल और धवल है
चोट न पहुंचाना किसी को
नही तो डूबना तय है
कश्ती जीवन रूपी
सत्कार सबका करो
भावों से अपने
हॄदय में स्थान अपार रखो
आस की डोर पकड़
आगे बढ़ते जाना
पार कर जाओगे
जिदंगी का सफर
कश्ती पर साथ
अपनों का जो हो
जिंदगी खुबसूरत अपार हो
थोड़ी असमंजस जो हो जाती
पतवार सँभाल
संयम रख तू
कश्ती तट पा ही लेती

✍️  प्रियंका प्रियदर्शिनी
फरीदाबाद हरियाणा
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#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
शीर्षक - कश्ती
विधा - कविता

नईया डूब रही अब भईया ।
आगे आओ सभी खेवईया ।।

सुंदर विषय मिली है कश्ती ।
फिर क्यों कलम अरु मस्ती ।।

जीवन नाव सदृश यह बाबू ।
डूबे नहीं, रखें  खुद  काबू ।।

बचपन याद दिला दे नईया ।
जिस डाँट रही थीं मईया ।।

कश्ती माफिक जैसे हस्ती ।
डूबे अगर रहे यह  सुस्ती ।।

तूफां ताक रही यह नौका ।
यारों अभी भुनाओ मौका ।।

निश्चित पार लगेगी नईया ।
थोड़ी काज करो ऐ! भईया ।।

✍️ मिथलेश सिंह मिलिंद
आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश)
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#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चमी_बंगाल_इकाई
# विषय-कश्ती
#दिनांक 30.10.2020

यह जो मुश्किल का दौर है
यूँ ही गुजर जाएगा
किसी को नहीं मालूम
क्या गुल खिलायेगा
किसको हंसाएगा किसको रुलाएगा
यह जो मुश्किल का दौर है
मिल जाएंगे आमने सामने
तो हाथ नहीं मिला पायेगा
गले मिलना तो दूर की बात
नमस्ते से ही काम चलाएगा
यह जो मुश्किल का दौर है
मन में सबके खौफ है
कोई कुछ नहीं कर पायेगा
यह अदृश्य होकर कर रहा है वार
सामने नहीं आएगा
चुनौतियां सामने है बहुत बड़ी
चट्टान की तरह हैं सामने खड़ी
तूफां हैं जोर का बहुत
परीक्षा की है घड़ी
जीतेगा वही जो अडिग रह पाएगा
यह जो मुश्किल का दौर है
घर के किवाड़ बन्द हैं
खामोशी चारों ओर
प्रलय की इस आँधी का
न ओर कोई छोर
यह आंधियों का बबंडर भी न टिक पायेगा
यह जो मुश्किल का दौर है
ऐसे कठिन दौर पहले भी आये हैं
हम सब ने मिलके पार पाए हैं
किश्ती भंवर में हम सबकी डोल रही है
मुकाबला करो यह सबको बोल रही है
हमको बचाने कोई तो ज़रूर आएगा
यह जो मुश्किल का दौर है
यूँ ही गुज़र जाएगा

✍️  रवींद्र कुमार शर्मा
घुमारवीं
जिला बिलासपर हि प्र
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय कश्ती
#विधा कविता

जिंदगी की कश्ती कुछ यू लगी किनारे पे,
हम डूबने से रह गए इश्क़ के मझधार मे,
बच गये सभी सवार थे हम जिस नाव पे,
डूबने चले थे हम जिस दरिया की धार में।

कौन था वो जो सुध ले रहा था हर हाल का,
था क्यूँ नहीं पता मुझे मेरे अर्ध्य के संहार का,
जब तक है साथ हो बाँका ना मेरा हो सका,
बस उसका विश्वास ले मन डूबने से मै बचा।

जब मझधार मे होते हम याद उसे करते हैं,
क्यूँ नहीं किनारे पर हम पुकार उसे लेते हैं,
उसी का संसार है और हम भी उसी से हैं,
जब तक है वो यहाँ हम यहाँ निडर रहते हैं।

✍️ सरिता त्रिपाठी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

_______________________________________
सादर नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय -कश्ती
#विधा-कविता
दिनांक-30-10-2020
दिन-शुक्रवार

   
   जीवन की कश्ती प्रभु से सहारे,
संसार रूपी नदी पार करो हमारे।
     प्रभु आप हो हारे के  सहारे,
   हम अवोध संतान  है  तुम्हारे ।
   मातृ गर्भ में हम प्रभु को पुकारे,
    जीवन की कश्ती धरा पर उतारे।
  मोहग्रसत होकर प्रभु तुम्हे बिसारे,
कश्ती डगमगा रही लगाओ किनारे।
  हम अज्ञानी ज्ञान नहीं   हमारे,
  ज्ञान दो प्रभु हो सबके प्यारे  ।
काम, क्रोध, लोभ नदी के धारे,
  जीवन की कश्ती करो किनारे ।
  
     हे! मोहन ,गोपाल, गिरिधारी,
     सुन लो अब विनती  हमारी।
   तुम्हारी कृपा  सदा जग में न्यारी,
     रक्षा करो अब श्याम, बनवारी ।

✍️  गौतम सिहं "अनजान "
पश्चिम  मिदनापुर
पश्चिम बंगाल
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कस्ती

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कस्ती ही जीवन जग सागर खेते मालिक हरि हरि
समय निकल जाता दो पल में रह जाता सब धरि धरि

किस्ति खुद खेने से अच्छा, रखो कश्ती खेवक अभिराम।
देखा गया विषम हालत में, हो जाता है युद्ध विराम।

मैंने अपनी इस कश्ती में ,ले रखे सौ से परिवार ।
मेरी प्रशंसा उठ कर पाना कल का जो अद्भुत अख़बार।

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T.K.Pandey
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जय माँ शारदे
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल
#विषय -कश्ती
#विधा - कविता
***************

मेरे जीवन कश्ती की,
तुम हीं मझधार बनो,
हृदय तट के तूफानों में,
तुम मेरे पतवार बनो |

विपदा की घड़ी है भारी, 
तुम जीवन की धार बनो,
बीच भंवर फांसी मेरी नैया,
तुम मेरे पतवार बनो  |

पथ है पथरीली,
तुम मेरे रहवार बनो,
वेदना असीम गंगा के,
तुम मेरे पतवार बनो |

मोह बंधन बंधी हिया के, 
तुम मेरे महवार बनो,
है प्रेम अगाध जो तुमसे,
तुम प्रियवर पतवार बनो|

✍️  स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता)
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#साहित्यसंगमसंस्थान पश्चिम बंगाल
#दिनांक : 30/10/2020
#विषय : कश्ती
#विद्या : पद्य
##################
समय के समुन्दर में बूँद सी बह रही ज़िंदगी थपका रही है जोर से द्वार मौत के नग्में सुनाती इंसान की उम्र की दहलीज़ पर।

हर पल यहाँ युद्ध है जठराग्नि की ज्वाला से जूझते गरलमय जीवन रथ चलता है विषैली तान सुनाते।

फैल रही है लपटे हर आवरण जलाते ज़िंदगी पड़ी है सत्य की खोज में झूठ का राग दोहराते।

झनझना उठती है मन की शिराएँ किचड़ नयन में भरे द्वेष का हर कोई अपना अमोघ ज्ञान सुनाएं।

क्रोध लड़ता है उबलते काल संग बह रही ज़िंदगी से छीनने चंद्रवदन से मादक लम्हों को समेटने।

इंसानी जिह्वा कैसे संभले बलशाली तूफाँ अपनी और खिंचे साहस के बल कश्ती खेने जीवन उत्ताल से खेलें।

✍️   भावना ठाकर, बेंगुलूरु भावु
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नमन मंच
साहित्य संगम संस्थान बंगाल इकाई
विषय - कश्ती
विधा = स्वैच्छिक
तिथि = ३०/१०/२०२०

कश्ती है पुरानी
प्रेम की कहानी
चल री सजनी
झील के उस पार
पीपल की छांव
चांदनी है रात
पहाड़ है ओढ़े
पूनम की रात
शरद है पूर्णिमा
प्यार है जवां
गीत गाये संग
संग आज
कोई ना आये
बीच हमारे
कश्ती लगने दो
झील के उस पार
साथ है दुल्हनियाँ
पिया के बईयोँ
स्वर्ग करे है
हमसे बात
ये सुख नाहीं
जग में माहीं
आओ चले
झील के उस पार।

✍️  उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार।

__________________________________

नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान , पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय : कश्ती
विधा : मुक्तक

मेरे जीवन के कश्ती का,
प्रभु पतवार बन जाओ।
तूफानों में घिरी उलझी,
कथा के सार बन जाओ।
करूँ दिन-रात  तेरी ही,
भजन, अरदास मैं वंदन।
प्रभु इतनी ही बस अर्जी,
तुम पालनहार बन जाओ।।

✍️ कुमार नवीन "गौरव"
______________________________
#साहित्य संगम संस्थान बंगाल इकाई
#विषय _ कश्ती
#विधा _ कविता

जीवन एक कश्ती समान
जलधार संग बहता इंसान
स्वयं ही पार लगानी कश्ती
बनकर कश्ती का खेवनहार

विकट परिस्थिति में ना डगमगाना
धैर्य के साथ आगे बढ़ते जाना
राह में जो भी बाधाएं आएं
हंसकर पार करते जाना

लहरें हो प्रचंड वेग पर
मन को सुदृढ़ बनाना
हौसला बुलंद करके
लहरों से टकराते जाना

जीवन के झंझावतों को
हिम्मत से पार करते जाना
किस्मत साथ ना दे अगर
मेहनत से आगे बढ़ते जाना

मझधार में कश्ती फंस जाए
कोई राह नजर ना आएं
इच्छाशक्ति दृढ़ बनाकर
मंजिल तक कश्ती को लाना

लक्ष्य को पाकर अपने
जीवन कश्ती को पार लगाना
जीवन एक कश्ती समान 
जलधार संग बहता इंसान।।

✍️  प्रेमलता चौधरी
फालना,पाली राजस्थान
_____________________________________
#साहित्य संगम संस्थान,पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय:-कश्ती
#विधा:-काव्य

#नमन मंच

बनानी कश्तियाँ कितना सरल होता है बचपन में।
चलानी कश्तियाँ लहरों में  घातक है लड़कपन में।।

बड़ी मुश्किल से कश्ती पार जाती है जवानी की।
सम्भलना फिर चलाना ही निशानी है नादानी की।।

तेरी कश्ती गृहस्थी की थोड़ी हिचकोले खाएगी।
मगर विश्वास रख पतवार पर ये पार जाएगी।।

बुढ़ापे की ये कश्ती कर्म की लकड़ी बनाएगी।
सुधारो कर्म कर लो धर्म नैय्या पार जाएगी।।

✍️  राम प्रकाश अवस्थी,रूह
जोधपुर, राजस्थान🙏

_____________________________________

#साहित्यसंगमसंस्थान #पश्चिम #बंगाल #इकाई

#दिनांक-30/10/2020

#विषय- #कश्ती

#विधा-#कविता


 #संसार है एक #नदिया,

 सुख -दुख दो किनारे हैं,

 #भवसागर में फंसी जीवन नैया,

 अब  #प्रभु #पार लगानी है।


 मेरी #जीवन #नैया के,

प्रभु तुम ही #खेवईया हो,

 #कश्ती को पार #लगा, 

#पतवार तुम ही तो हो।


  #तूफान ने घेरा है,

  नहीं दिखता #किनारा है,

 अब भंवर में #कश्ती है,

 #प्रभु तेरे #हवाले हैं।


 अब #थाम लो हाथ प्रभु,

 #विनती यही तुमसे है,

 #हिचकोले खाती #कश्ती,

 #बेकाबू  हुई  मुझसे ।


 गर तेरी #कृपा हो गई,

 तो #कश्ती भी पार हुई,

 यह #आशा है प्रभु मेरी,

  #करना #भव- पार मुझे।


✍️  रंजना बिनानी

गोलाघाट असम

_____________________________________

_____________________________________


नमन मंच 🙏 

#साहित्य संगम संस्थान,पं. बंगाल 

दिनांक-30/10/2020

विषय-कश्ती

विधा-सेदोका


शीर्षक-कश्ती


मंझधार में

न फँस जाए कश्ती 

दृढ़ निश्चय कर

पार लगाना

मंजिल पहुँचेगा

रखना हौसला तूं।।


लहरें चाहे

कितनी हो प्रचंड

चट्टान हो जाना तूं

परिश्रम से

नव पथ बनाना 

कश्ती पार लगाना।।


संकट छाए 

चाहे छाए तमस

विकट परिस्थिति

आए कितनी

धैर्य संग आगे तूं

बढ़ता ही चलना।।


✍️ सुमन राठौड़

झाझड

_____________________________________

नमन मंच

#साहित्य संगम संस्थान, पश्चिम बंगाल इकाई

#विषय शब्द: कश्ती

#विधा: स्वैच्छिक (कविता)

#दिनांक:30\10\20

*******************

हूँ मैं जीवन की कश्ती में सवार,

तुम ही बनना प्रभु इसके खेवनहार,

नैया मेरी पार लगाना,

बीच भंवर में ना फंसाना।


बचपन तो था नदी का किनारा,

जवानी आई बढ़ गया पानी,

अब तो बुढ़ापा आ रहा,

बीच लहर में है मेरी नैया।


जीवन की नैया तो डगमग करे,

कौन साथ मेरा देगा,

कौन मेरे साथ चलेगा,

यह सोच सोच कर मन है डरे।


पतवार मेरी तुम थाम लेना,

धीरे-धीरे इसे चलाना,

सदा ही रहूंँ मैं चलती फिरती,

बीमार कर मुझे बिस्तर पर ना सुलाना।


अपनी सेवा का अवसर देना,

गलत सही से मुझे बचाना,

उम्र भर करुँ सेवा तुम्हारी,

मुझे मुक्ति का द्वार दिखाना।

###############


✍️ अभिलाषा "आभा"

गढ़वा (झारखंड)

_____________________________________


🙏#नमन_साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई_मंच🙏

🌷विषय : #कश्ती ; विधा : #स्वैच्छिक🌷

🌹दिनाँक : 30/10/2020 ; दिन : शुक्रवार🌹


हे प्रभु जी मेरी विनती,.... भव सागर है उतरना।

चरणों का मैं पुजारी,..... मेरी कश्ती पार करना।।


जीवन है एक नइया,........ हिचकोले ले रही है।

कहीं डूब ये न जाए,........... पतवार खे रही है।।

मल्लाह मेरे तुम हो,...... बस इतनी कृपा करना।

चरणों का मैं पुजारी,...... मेरी कश्ती पार करना।।


ये जग है भव का सागर, यहाँ सब कुछ डूबता है।

गर पार हो जो जाना,........ कश्ती को ढूंढता है।।

हे मेरे कृष्णा स्वामी,...... मेरी लाज आप रखना।

चरणों का मैं पुजारी,...... मेरी कश्ती पार करना।।


ये कृष्णप्रेमी चरणों,........... में आपके है आया।

है प्रेम का भिखारी,......... कर दो प्रभू जी दाया।।

कश्ती न डूब जाए,...... प्रभु ध्यान इसका रखना।

चरणों का मैं पुजारी,....... मेरी कश्ती पार करना।।


                        


💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

-माँ श्री राधारानी के पावन श्रीचरणों की पावन ' रज '

                "कृष्णप्रेमी" गोपालपुरिया प्रमोद पाण्डेय

💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

_____________________________________

मंच को नमन

दिनांक 30/10/20

विषय   कश्ती

विधा कविता


मन में तू बस आस रख

एक तू विश्वास रख

धैर्य को बनाये रख

कश्ती फिर तो पार हो जायेगी



भावना को शुद्ध रख

आचरण विशुद्ध रख

नौका नैया रही रख

पार फिर तो हो जाएगा



राह अपनी रही रख

नेक नीयत साफ रख

तरणि तरनी में बैठकर

पार फिर तो हो जाएगा



संग अपना सही रख

ढंग अपना सही रख

पोत बोट में बैठकर 

पार फिर तो हो जाएगा


✍️ डॉ प्रकाश चमोली

श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड भारत

_____________________________________


🙏मंच को सादर प्रणाम🙏

 #साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई 

#विषय-कश्ती 

#विधा-कविता 

#वार_दिनांक-शुक्रवार, 30/10/2020


    ***कश्ती***


चलती कश्ती मांझी की 

करती लहरों को प्यार, 

रुकावटों को लाँघकर 

करती कश्ती हंस पार। 


आर्थिकता का भार ढोती 

करती है राष्ट्रीय व्यापार, 

तूफानी हरकतों से सामना 

झेलती लहरों कि मार। 


मांझी-कश्ती का अनूठा 

बेनज़ीर है परम यार, 

ज़ब जी चाहा ले चलो 

रहती हरदम वो तैयार। 


आ जाए कभी बाधाएँ 

तो चाबुक इसका हथियार, 

रामचंद्र जी को छोड़ कर 

पद्चरणो का माने उपकार। 


        

         ✍️विकाश बैनीवाल 

           हनुमानगढ़(राजस्थान)



_____________________________________

नमन 🙏:- साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई

दिनांक :- 30/10/2020

दिवस :- शुक्रवार

विषय :- कश्ती 

विधा :- स्वैच्छिक

विषय प्रदाता :- आ.कुमार रोहित रोज़ जी

विषय प्रवर्तक :- आ. स्वाति पाण्डेय जी


दिल तोड़ी , आज फिर क्यों हंसती है ,

मेरे अंदर झांक कर तो देख ,

हमेशा तू ही बसती है ।।

पता है अब न मेरे जीवन में 

मस्ती है ,

डूबा नहीं पार करने 

वाला मेरा कश्ती है ।।


जिससे 

पार किया हूँ ,

तुम्हारे तरह मैं न

हर एक दिल पर राज 

किया हूँ ।।

दिल क्या

दिमाग़ का भी 

इलाज किया हूं ।।

पता न मैं रोशन 

आज क्या हूँ ।।


✍️  रोशन कुमार झा

सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज कोलकाता,

ग्राम :- झोंझी , मधुबनी , बिहार


_____________________________________

_____________________________________

#नमन साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#दिनांक-30/10/2020
#दिन- शुक्रवार
#विषय- कश्ती
#विधा- पद्य

जीवन  कश्ती  भव सागर  में डूब  रही है,
जीवन  में  नहीं  दृष्टिगोचर  कोई सहारा।
जीवन  में  सर्वत्र  घनेरी षतिमिर छाया है,
अब इस जीवन को  कैसे  मिले  किनारा॥

इस  विकट परिस्थिति  से उबरने के लिए,
रग-रग में नव जोश सृजन  करना  होगा।
जीवन  नैय्या  को  प्रतिपल  सुरक्षित कर,
साहिल  के  सदृश  अडिग  रहना  होगा॥

निज  हृदय अज्ञान तिमिर  अवसान कर,
जीवन  प्रशस्त पुण्य पथ पर चलना होग।
जीवन में उतार चढ़ाव होना जग की नीत,
डूबती हुई जीवन कश्ती से उबरना होगा॥

समंदर   के    तीक्ष्ण   थपेड़ों  से  साहिल,
सदा  नियत   स्थान  पर  स्थित  रहता है।
मानव को  तूफानों  के आवेग  में  आकर,
निज   जीवन    को   सुखमय  करना  है॥

                  
    ✍️     मनोज कुमार चंद्रवंशी
बेलगवाँ जिला अनूपपुर मध्यप्रदेश

_____________________________________
#साहित्य संगम संस्थान  पश्चिम बंगाल
#विषय प्रवर्तन
विषय कश्ती
विधा कविता
दिनांक 30 अक्टूबर 2020

निजहौसले से प्यार कर ,
तूं  बैठ  नहीं   हार   कर,
पुरुषार्थ  के  अधीन दैव,
विघ्न का  प्रतिकार कर।
कश्ती को किनार कर।।

माझी बिन किश्ती कैसी,
जल   विहीन नदी जैसी,
महा विघ्न  करे विरमित,
अब   बैठ नहीं  हार कर
कश्ती  को किनार कर।।

कश्ती जब करे डगमग,
आत्मबल करो जगमग,
विपदा को खुद टाल ले,
हर विघ्न पर प्रहार कर।
कश्ती  को  किनार कर।।

लड़ो   तू  आन  बान से,
हर   समुद्री   तूफान  से,
भाग्य  का तू शिल्पकार,
कटु   सत्य स्वीकार कर।
कश्ती   को किनार  कर।।

      
✍️  रामप्रवेश पंडित
मेदिनीनगर झारखंड
_____________________________________
साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक :- 30/10/2020
दिवस :- शुक्रवार
विषय :- कश्ती

विषय-कश्ती
विधा-सायली छंद
***********
1
कश्ती
जब डूबती
रोते हैं लोग
कैसा है
संजोग
2
चले
कश्ती समुद्र
लगाती जन पार
डूबे नांव
हार
3
कश्ती
किनारे लाए
जन को हंसाये
कभी जन
डूबाये
4
कश्ती
निराली होती
ले जाए पार
बिना इसके
हार।
*********************
स्वरचित, नितांत मौलिक
*******************
✍️  होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला-महेंद्रगढ़ हरियाणा

_____________________________________
1. आ.मनोज कुमार पुरोहित
2. आ.धीरज कुमार शुक्ला "दर्श"
3. आ.गिरीश इन्द्र
4. आ.स्वाति"सरू"जैसलमेरिया
5. आ.कलावती कर्वा
6. आ.फूल चंद्र विश्वकर्मा
7. आ.वर्तिका अग्रवाल
8. आ. आभा सिंह
9. आ.रोशन बलूनी
10. आ.रूचिका राय
11. आ.राजा बाबू दुबे
12. आ.अन्जनी अग्रवाल ओजस्वी
13. आ.दामोदर मिश्र बैरागी
14. आ.अमित कुमार बिजनौरी
15. आ.एम. एस. अंसारी
16. आ.बृजमोहन रणा ,कश्यप
17. आ.रजनी हरीश
18. आ.बेलीराम कनस्वाल
19. आ.सुनील कुमार
20. आ.सुधीर श्रीवास्तव
21. आ.प्रियंका प्रियदर्शिनी
22. आ.मिथलेश सिंह मिलिंद
23. आ.रवींद्र कुमार शर्मा
24. आ.सरिता त्रिपाठी
25. आ.गौतम सिहं "अनजान "
26. आ.T.K.Pandey
27. आ.स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी
28. आ.भावना ठाकर
29. आ.उदय किशोर साह
30. आ.कुमार नवीन "गौरव"
31. आ.प्रेमलता चौधरी
32. आ.राम प्रकाश अवस्थी,रूह
33. आ.रंजना बिनानी
34. आ.सुमन राठौड़
35. आ.अभिलाषा "आभा"
36. आ.प्रमोद पाण्डेय
37. आ.डॉ प्रकाश चमोली
38. आ.विकाश बैनीवाल
39. आ. रोशन कुमार झा
40. आ.मनोज कुमार चंद्रवंशी
41. आ.रामप्रवेश पंडित
42. आ.होशियार सिंह यादव
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