साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई दैनिक लेखन क्रमांक :- 4

साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई दैनिक लेखन क्रमांक :- 4

साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई के दैनिक लेखन क्रमांक :- 4

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#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
#विषय_प्रवर्तन
#गुरुवार (29-10-2020)
#विषय #पिता
#विधा #स्वैच्छिक
विषय प्रदाता :- आ. रोशन कुमार झा जी
विषय प्रवर्तन :- आ.मिथलेश सिंह मिलिंद जी

नोट - अपनी रचना के साथ #हैशटैग #साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई का प्रयोग जरूर करें! और अपनी रचनाएँ #विषय_प्रवर्तन के #कमेंट_बॉक्स में ही प्रेषित करें!
पिता नाम अपने आप में एक उत्कृष्टता का परिचायक है । परिवार के निर्माण व निर्धारण में एक पिता की भूमिका नमनीय होती है । माँ को जहाँ सृष्टि को गतिमान रखने का दायित्व प्राप्त है वहीं पिता को सृष्टि की गतिशीलता में ऊर्जा के संचार का नेतृत्व प्राप्त है । जिस प्रकार वायु के बिना जीवन असंभव है उसी प्रकार पिता के बिना जीवन चक्र असंभव होता है अर्थात् पिता वह अगाध सागर है जिसमें संसार की सम्यक श्रेष्ठता विद्यमान होती है । पिता के स्वरूपों व उसके दायित्वों को परिभाषित कर पाना एक असंभव कार्य है।

पिता प्रमुख उम्मीद है, पिता जगाए आस ।।
पिता बना परिवार का, हिम्मत अरु विश्वास ।।

बाह्य आवरण सख्त है, अंदर से वह मोम ।।
मन का यह विस्तार तो, लगता जैसे व्योम ।।

हर संकट में यह खड़ा, बनकर के दीवार ।।
सदा बढ़ाएँ हौसला, देता बुद्धि विचार ।।

पिता कृष्ण सा सारथी, ढ़ोता सबके भार ।।
हमें हँसाने के लिए, जाता खुद वो हार ।।

आपका अपना
मिथलेश सिंह मिलिंद
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# नमन मंचपटल ।
# दिनांक .29 .10 .2020 .
# वार .गुरुवार ।
# विषय .पिता ।
# विधा .कविता ।
हमारी जिदंगी में ,पिता भगवान होता है ।
करो उसकी सेवा तो ,वैकुंठधाम में वास होता है ।।
अपने अरमानों को ,कुचल कर तुमको सजाता है ।
कठोर परिश्रम करके ,तुम्हारे सपने सजाता है ।।
अंगुली पकड कर जिसने ,चलना सिखाया है ।
तुम्हारे सपने सजाने ,दिन रात परिश्रम किया है ।।
तुम्हें पाने को उसने ,कयी मंदिरों के धंटे बजाए है ।
कयी देवताओ के दर पर ,जाकर शीश झुकाये है ।।
भुखा रह कर भी तुम्हें ,नेवाला खिलाया है ।
कर्ज लेकर भी तुम्हें ,शिक्षा दिलवाई है ।।
उसके अनेक उपकार है ,तुम पर ।
कही तुम पराईजाया के ,कहने पर उसे भुल मत जाना ।।

✍️  बृजमोहन रणा ,कश्यप ,
कवि ,अमदाबाद ,गुजरात ।
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नमन मंच
#पिता
मां की ममता तो पिता की छांव है जरूरी
मां की डाँट में भी पिता का प्यार है जरूरी

मां की तपस्या तो पिता का संघर्ष याद आता है
हर लम्हा हर दर्द चुनौती में मां के साथ
पिता याद आता है

पिता के मजबूत कंधों से सहारा का
एहसास होता है
हर लम्हा सुकून दे जाता है
जब पिता का हाथ सर पर होता है
हर पल
आर्शीवाद उनका संग संग रहता है

✍️  निक्की शर्मा
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#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
#विषय_पिता
#विधा--कविता

उनसे ही निशा_ प्रभात
उनसे ही दिन की शुरुआत
हर दिन है उनका उपहार
वरना हम तो थे मंझधार
                मां ने हमको जब छोड़ा
                बस पापा थे पालनहार
               दुनिया ने ठुकराया था
             मां ने भी साया उठाया था
क्या मातृदिवस क्या पितृदिवस
हमने हर दिन देखा संघर्ष दिवस
आपकी छत्रछाया में हमने पाया
सफल सुवासित प्रतिष्ठित दिवस
               ऐसा आशीष रहे हम पर
                कर्तव्य मार्ग पर हो प्रस्तर
                'राखी' जीवन का ध्येय यही
                मान आपका रहे जन्म जन्मांतर।।

✍️   सरिता तिवारी'राखी'
जबलपुर मध्यप्रदेश

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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान,  पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय : पिता
#विधा : गीत

बापू लो फिर से गोदिया उठाई,
मैं गुड़िया बचपन की ।
बापू सीने से ले लो लगाई,
मैं बिटिया बचपन की ।।

हाथ पकड़ बापू चलना सिखाई दो,
बाँहों में अपने झुलनिया झुलाई दो।
दे दो थपकी.... हाय..
दे दो थपकी से मुझको सुलाई।
मैं गुड़िया बचपन की ।।
बापू सीने से ले लो लगाई,
मैं बिटिया बचपन की ।।

उलझे लटों को मेरे चुटिया बनाई दो,
बस्ते संग बापू स्कूलिया पढाई दो।
होखे छुट्टी तो.... हाय...
होखे छुट्टी लो बस्ता उठाई ।
मैं गुड़िया बचपन की ।
बापू सीने से ले लो लगाई,
मैं बिटिया बचपन की ।।

✍️  कुमार नवीन "गौरव"
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# साहित्य संगम संस्थान
#बंगाल इकाई
दिनांक 29-10-2020
विषय पिता

पतवार बन सबकी जीवन नैया जो तिराता।
सुख दुःख में सम भाव से परिवार का साथ निभाता।
जीवन के उतार चढ़ाव से अवगत जो करवाता।
सपनों को साकार करने हेतु खून पसीना बहाता।
सबके लिए खुशियां जो परिवार में लेकर आता।
हर मुसीबत लेता अपने सर पर फिर भी वो मुस्कुराता।
निडर साहसी बनने का सच्चा  पाठ पढ़ाता।
परिवार के चमन में जो खुशी के फूल खिलाता।
जीवन के हर मोड़ पर उजाला जो फैलाता।
सूर्य सम उज्जवल रूप जिसका पिता वो कहलाता।

✍️  रजनी हरीश
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनाँक-29.10.2020
दिवस-गुरुवार
#विषय-पिता
विधा-कविता

           पिता
        ●●●●●●
अपनी खुशियाँ त्याग कर
अपना भाव खो दे
औलाद की खुशियों पर
खुद को वार दे
वो पिता है।
कभी हाथी कभी घोड़ा
कभी बच्चा बनकर
अपने आंसू पीता जो
वो पिता है।
दुःखी बच्चे न हों
इसलिए जो
अपनी हर व्यथा हर पीडा़
छुपा सहते हुए जीता
वो पिता है।
हर दर्द सहते हुए भी
औलाद संग खिलखिलाये
वो पिता है।
कभी न घबराने
अपने साथ होने का
वटवृक्ष की तरह साये का
जो अहसास कराये
वो पिता है।
                     ✍️      :::::सुधीर श्रीवास्तव
                                   गोण्डा(उ.प्र.)
                             ©मौलिक, स्वरचित

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नमन मंच
# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
दिनांक 29 अक्टूबर 2020
दिन- गुरुवार
विषय-पिता
विधा- कविता
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देवतुल्य पिता हमारे
जीवन का आधार हमारे
खुशियों के खातिर हमारे
सब कुछ अपना हैं वारे
देवतुल्य पिता हमारे।
धरती पर ईश्वर का रूप धारे
सुख-दुख में बने सहारे
सपनों के खातिर हमारे
सुख-चैन अपना हैं वारे
देवतुल्य पिता हमारे।
कष्ट कभी न इनको देना
कटु वचन न इनको कहना
ये ही तो पालनहार हमारे
देवतुल्य पिता हमारे।
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✍️    सुनील कुमार
जिला- बहराइच,उत्तर प्रदेश।

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🌹साहित्य संगम संस्थान ,पश्चिम बंगाल इकाई🌹

दिनांकः २९.१०.२०२०
दिवसः गुरुवार
छन्दः मात्रिक
विधाः दोहा
विषयः पिता
शीर्षकः 🌺पिता आप भगवान🌺

आनंदित  निज  पूत पा , किया  समर्पित  जान।
पिता त्याग सुख शान्ति को ,पूरण सुत अरमान।।१।।

लौकिक   झंझावात को , पिता  सहे   चुपचाप।
धूप   वृष्टि  या  शीत  हो , यायावर       संताप।।२।।

पूत  चढ़े  सोपान  को , पिता    सहे  अपमान।
कर्ता  भर्ता  जनक बन , स्नेह  सींच    सन्तान।।३।।

संवाहक परिवार का , निर्वाहक  नित   समाज।
संघर्षक  भर    जिंदगी ,  निर्माणक सुत आज।।४।।

पूत पिता पति निर्वहण ,बड़ा कठिन यह काम।
करता  पूरण  संतुलित , मूक  बना   निष्काम।।५।।

पूत  प्रगति बस चाह नित , पाए सुख मुस्कान।
दिवस रात्रि कर झूठ सच,धन अर्जन अपमान।।६।।

पूर्ण हुआ सुत लक्ष्य जब ,पितृभक्ति सह मान।
सेवा    श्रद्धावनत  हो , करे   पिता    सम्मान।।७।।

ममता नित पृथिवी समा ,दृढ़ पर्वत सम चित्त।
दानवीर बलिराज सम , हो पितु    पूतनिमित्त।।८।।

जीवन दे जिस बाप ने,चुका सकूँ नहि कर्ज।
पाल पोष अस्तित्व दे , नित सेवन  सुत फ़र्ज़।।९।।

पितृ दिवस पर आज हम,साश्रु नैन कर याद।
करता  हूँ  सादर   नमन , दें  आशीष  प्रसाद।।१०।।

अर्पित है श्रद्धासुमन , अथक त्याग बलिदान।
कृतज्ञ सदा निकुंज है , पिता आप   भगवान।।११।।

कमी खले बस आपकी ,  नहीं माथ पर छाँव।
सब  खुशियाँ  दी आपने , मैंने दी  बस   घाव।।१२।।

आप गये माँ  भी गई , ममता  छत्र     विहीन।
आज  अकेला लोक में , शोक रुदित श्रीहीन।।१३।।

जहँ भी  हों आशीष दें ,रखें मातु का ध्यान।
शान्ति मिले नित आपको,मातु साथ सम्मान।।१४।।

अपराधी    कुपूत मैं , किया न सम्यक् मान।
अवसादित  हूँ मैं पड़ा , करें  तात  क्षमदान।।१५।।

आप  पूत पहचान हैं , कुलपौरुष अभिमान।
सारस्वत  सम्मान  हैं , पिता आप  हैं   शान।।१६।।

✍️  डॉ. राम कुमार झा "निकुंज"
रचनाः मौलिक(स्वरचित)
नई दिल्ली
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#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
#विषय:पिता
#विधा:कविता
शीर्षक:पिता है वह

वह मुँह से कुछ नहीं बोलता,
ना जाने कितनी मुसीबतों को झेलता,
सुबह से शाम तक चुपचाप पाई-पाई जोड़ता,
कभी किसी की तो, कभी किसी की बकवासों को सुनता,
पिता है वह, बस यही बात उसे मजबूती देता l

वह अथक परिश्रम करता,
अपनी परवाह वह कहाँ करता ?
वह पिता है कभी सूरज -सा तपता,
कभी बिजली-सी कड़कता,
कभी बारिस की बूंदों -सा मुसकुराता l

वह अपनी संतानों की सपनों को,
अपना सपना बना आजीवन जीता,
वह पिता है जो किसी से शिकवा नहीं करता,
अपने खुशियों को कब आगे रखता ?
पिता है वह, बस यही बात उसे मजबूती देता l

✍️  स्वाति पाण्डेय
कोलकाता,पश्चिम बंगाल
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
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मंच को नमन
दिनांक 29/10/20
विधा कविता
विषय पिता

मेरी शान मेरी जान स्वाभिमान है पिता
प्रेम त्याग मोह के प्रतिमान है पिता
पिता ख्वाईश को पूरी करने वाले
आकाश से ऊंचे
असीम प्यार देते हैं
वे सबकुछ भी लुटाते हैं
अहमियत क्या पिता की है
जाने पर पता लगता
अपने से भी बढ़कर वे
अपने पुत्र को चाहते
वसीयत हो नसीयत हो
सदा वे देते रहते हैं
पिता ही स्वर्ग धरती का
पिता ही धर्म धरती का
पिता से है नहीं बढ़कर
कोई तप इस धरा जहां में
पिता पुत्रों के खातीर सब
जीवन तक लुटाते हैं
वचन चाहे कठिन कितने
वे दिल से नेह करते हैं
अगर धरती में हम कुछ है
तो उनकी ही बदौलत है

✍️  डॉ प्रकाश चमोली
वैभव भवन नर्सरी रोड श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड,

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#नमन   मंच
#साहित्य संगम संस्थान पस्चिम बंगाल
#विषय   पिता
#दिनांक 29,10,2020
#दिवस  गुरुवार
         पिता
हर किसी का होता परिवार।
जहाँ सीखते गुण, व्यवहार ।।
हर एक कुछ न कुछ सिखलाता।
जो मुखिया है, वो पिता कहलाता।।
घर परिवार की जिम्मेदारी।
सच मे पिता पर रहती सारी।।
हर किसी की मांग पूरी करते।
अपने कर्म से कभी न थकते।।
सुबह सवेरे काम पर जाते।
देर सायं जब थककर आते।।
बैठ परिवार संग मुस्कराते।
अपनी थकान पीड़ा को छुपाते।।
जब ,जब त्योहार आते।
सब को नई ,नई चीज दिलाते।।
खुद की जब आती बारी।
कहते मुझ पे चीज है, सारी।।
छुपाते हम सबसे अपनी लाचारी।
जग में नही ऐसा परोपकारी।।
देख के सबके चेहेरे पर मुस्कान।
मिटा देती ये उनके चेहरे से थकान।।
हम को पढ़ा ,लिखा कर सजग करते।
हमको अच्छे पद पर कार्य दिलवाते।।
बेटा ,बेटी एक समान मानकर।
सब का घर परिवार बसाते।।
सब को बहुत कुछ दे जाते।
बदले में हम किया कर पाते।।
चुकाना होगा हमे उनका ये कर्ज।
बुढ़ापे में उनकी लाठी बनना हमारा फर्ज।।

✍️  जमुना प्रसाद उनियाल
ज्ञानसू उत्तरकाशी उत्तराखंड

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नमन मंच 🙏🏻#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
#विषय > पिता
#विधा >कविता (स्वैच्छिक)
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करूँ मैं कैसे बखान पिता का,
मेरी क़लम में इतना ज़ोर नहीं
नमन करो हर रोज़ पिता को,
जग में उनके जैसा कोई नहीं।

जन्म से लेकर जवानी तक,
पूरा ख़्याल हमारा रक्खा था।
एक छोटी सी चोट पे हमारी,
दर्द-स्वाद पिता ने चक्खा था।

आमदनी कम फिर भी हमारी,
वो ज़रूरतों को पूरा करते थे।
जीते सिर्फ़ औलाद की ख़ातिर,
औलाद की ख़ातिर मरते थे।

पापा पापा! जब छोटे थे हम,
रोज़ चिल्लाया करते थे।
अब इतने ख़ामोश है क्यों वो,
नाम बेटों का लेने से डरते थे।

दिल्लगि अपनो से करते हो,
कभी उनसे भी कर लिया करो
वक़्त जब देते हो अपनो को,
थोड़ा उनको भी तो दिया करो

तकलीफ़े ना देना उन्हें कभी,
चाहे रब की पूजा मत करना।
पूजनीय सर्वोपरि हे रब से वो,
वरना कष्ट पड़ेगा फिर सहना

सेवा कर लो मॉ-बाप की पूरी
दूआ ईश्वर तक उन्की जाएगी
सुन ली पुकार उन्की जो रब ने
आपकी हर बिगड़ीबन जाएगी

✍️  सुधीर सोनी बाली ज़िला पाली राजस्थान
स्वरचिय मौलिक

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नमन मंच
#साहित्य_संगम_संस्थान  पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय- पिता

*मेरा गर्व  मेरे पापा*

मुश्किलों की हर
कड़ी धूप भी
सह लेते है पापा
हर गम को पीकर
मौन रहते है पापा
दिल में प्यार
आंखों में
करुणा का सागर
रब के बनाये कोई
फरिश्ता है मेरे पापा

मेरे पापा मेरा गर्व ...

अपनी मुस्कान से
घर आँगन महका देते
दूर रह कर पास होने का
हरदम एहसास दिलाते
जो पानी से भी
तरल और पत्थर से भी
कठोर होने का एहसास
करा जाते पर..
पापा बेटियों की
हर खुशी के लिए
कुछ भी करने के लिए
नहीं हिचकाते

मेरा गर्व  मेरे पापा..

निर्मल मन सरल स्वभाव
नहीं किसी के प्रति दुर्भाव...
मेरी नजर में दुनियां के
सबसे सुंदर इंसान ...
मेरे पापा
जिस पर
मैं करती हूं अभिमान ...
बहुत हताशा मिली
मेरी वजह से पर ....
पापा विश्वास रखना
एक दिन मैं जरूर
बनूँगी आपकी शान  ।।

✍️  स्वाति'सरु'जैसलमेरिया
जोधपुर (राजस्थान)

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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान,बिहार इकाई
दैनिक प्रतियोगिता
29.10.2020
विधा - कविता
विषय -   पिता
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मां होती ममता का दरिया,धैर्य का सागर होता पिता
मन की बात समझे मां तो भविष्य हमारा देखे पिता।

त्याग, समर्पण ,धैर्य ,अनुशासन का पर्याय बनकर
इस जगत में ईश्वर का ही एक रूप बनता है पिता।

होता है सदा हृदय उसका एक फूल से भी कोमल
व्यक्तित्व पर्वत चट्टानों सा कठोर रखता है पिता।

जीवन के अंधेरों में खुद को जलाकर करता रोशनी
ज़िन्दगी की धूप में बरगद की गहरी छांव सा है पिता

हर शब्द,हर परिभाषा बहुत बौनी है सामने उसके
महानता में आसमान से भी ऊंचा होता है पिता।

अपने लिए बुने सपनों को खोकर भी सदा वो
सबकी खुशियों की ईमारत खड़ी करता है पिता।

अपने आशीष का अमृत सदा बरसाकर हम पर
जीवन में नित संघर्ष करना सिखाता है एक पिता।

तन, मन,धन से जीवनभर रहता स्वयं समर्पित
परिवार संतान के लिए सदा तत्पर रहता है पिता।

संवेदनाओं को अपनी नहीं करता कभी उजागर
कर बेटी की विदाई मन ही मन रोता है एक पिता।

मेरा साहस,मेरा विश्वास,मेरा अभिमान है मेरे पिता।
मेरा अस्तित्व, मेरी पूंजी, मेरी पहचान है मेरे पिता।

🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷🌷
✍️  पवन सोलंकी
सुमेरपुर, पाली,राजस्थान।

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#साहित्य संगम संस्थान प बंगाल इकाई
#दिनांक  २९-१०-२०२०
#विषय  पिता
#विधा  कविता

पिता स्रष्टा पिता भर्ता पिता रक्षक हमारा है।
पिता साथी पिता सारथी पिता शिक्षक हमारा है।।

पिता के संग में बच्चे सुरक्षित महसूस करते हैं।
पिता दृढता की मूरत है पिता धीरज हमारा है।।

पिता की शान में कहना सूर्य को दीपक दिखाना है।
पिता की ज्योति से जगमग यह व्यक्तित्व सारा है।।

पिता के अनुभवों से सीख ले आगे बढ़े हम सब।
मार्गदर्शक पिता बनता हमें देता सहारा है।।

सभी गम स्वयं पर लेकर हमें खुश देखना चाहे।
छत्र बन तन रहे हरदम तुहिन दुख का इशारा है।।

पिता का मान बढ़ जाए यही हो ध्यान हम सब का।
करें वे गर्व बच्चों पर यही कर्तव्य हमारा है।।

✍️  ‌फूल चंद्र विश्वकर्मा
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नमन मंच
विषय -पिता
दिनांक//29-10-2020

अपनी इच्छा छुपा के हरदम
खुशियों की गंगा बहाते हैं
वो तो हैं एक कल्पतरू
आशा की किरण जगाते हैं ।।

तपती धूप हो या भीषण सर्दी
जिम्मेदारी खूब निभाते हैं
उनसे ही है जन्नत अपनी
हर मन्नत पूरी कर जाते हैं ।।

हैं जीवन के सूत्रधार पिता
ढाल बन साथ निभाते हैं
पथ - प्रदर्शक बन जीवन में
आत्मविश्वास भर जाते हैं ।।।

वात्सल्यमयी डाँट सुनाकर
दुनिया का गणित सिखाते हैं
सींचते रहते नव पल्लव को
कुशल बागबां बन जाते हैं ।।

अपने सपनों को स्वाहा करके
समर्पण का पाठ पढ़ाते हैं
हृदयोदगार बयां करूँ तो कैसे
शब्दकोष भी कम पड़ जाते हैं ।।

हरपल हाथ रहे सर पर तेरा
ईश्वर से यह अर्जी कर जाते हैं
स्वस्थ रहें और सबल रहें आप
यह प्रार्थना निशदिन कर जाते हैं ।।

✍️   अर्चना गुप्ता
अररिया बिहार
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नमन माँ शारदा
दिनाँक 29/10/2020(गुरुवार)
#गीत
विषय पिता
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जब तक था तू गोद में, दिखा पिता का प्यार।
जबसे शादी हो गई, लगे पिता बेकार।

पाल पोश कर बड़ किया, और उठाए नाज।
उनके बलबूते किए, कई साल तक राज।
रक्त-स्वेद मजबूर क्यो, दिखते हैं वो आज।
समझो उनकी पीर को, वह तेरा संसार।
जब तक था तू गोद में, दिखा पिता का प्यार।

बीबी बच्चे हो गए, गया पिता को भूल।
याद रहे वे राह में, सदा बिछाए फूल।
चरणों को वंदन करो, माथ लगाओ धूल।
मुक्ति मिलेगी पाप से, यह ग्रंथो का सार।
जब तक था तू गोद में, दिखा पिता का प्यार।

चार पाँच को पाल कर, किया नहीं अभिमान।
वे बच्चे रखते नहीं, एक पिता का ध्यान।
करें उम्मीद क्यों भला, मिले पुत्र से मान।
पतझड़ चुन ली आप ही, कैसे रहे बहार।
जब तक था तू गोद में, दिखा पिता का प्यार।

पिता धरा पर ईश का, कहते हैं वरदान।
जिनके चरणों मे मिले, सच मुच् के भगवान।
उन्हें वृद्धाश्रम भेज कर, समझ रहे हो शान।
याद रखो कल पुत्र भी, करें यही व्यवहार।
जब तक था तू गोद में, दिखा पिता का प्यार।

✍️   मनोज कुमार पुरोहित
अलीपुरद्वार, पश्चिम बंगाल
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय पिता
#विधा कविता
पिता
पिता है मूल जीवन का, दिखाता ना प्यार है
खेता जो नाव जीवन का, देखता ना धार है
हमारी पहचान जिससे है, जो हमारा मान है
हमारे जीवन का पिता से ही, बस आधार है
हमारी इच्छाओं को, वो देता आयाम है
हमारी प्रतिभाओं को, वो देता उड़ान है
दिखता है बड़ा ही सख्त, अंदर से आसान है
हमारी प्रतिस्पर्धा खातिर, किया जीवन कुर्बान है
समझते ना लोग हैं उसको, ना उसको गुमान है
अपनी कर्तव्य निष्ठा का, उसे बेशक पहचान है
भुला कर हर अपनी इच्छा, लोगों का ध्यान रखता है
बदले में ना कभी किसी से, कोई अरमान रखता है
जीवन में स्वाभिमान का, हमें वो पाठ पढाता है
चले हम उसके पद चिन्ह, उसका मान बढ़ाता है
जो बनते हैं जीवन में हम, पिता का हाथ होता है
जीवन के हर कठिनाई में, पिता का साथ होता है
भूलों ना कभी तुम, उसकी उम्मीदों का दामन
हर पिता को अपनी संतति, पर नाज होता है
समाज में गर्व से वह भी तो कहता है
हमारे संतान का दुनिया में साज होता है
बेशक आज हम नयी पीढी के लोग हैं
अपनों के नाम से बहुत दूर हुए हैं
कुर्सी से नाम से सब मशहूर हुए हैं
पर वो अस्तित्व वो सुकून बसता है हमारे गावों में
जहाँ हम सिर्फ और सिर्फ पिता से जाने जाते हैं
पिता से जाने जाते हैं

✍️  सरिता त्रिपाठी
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल मंच को नमन।
#दिनांक :  29 अक्टूबर 2020.
#दिन : गुरुवार।
#विषय : पिता।

               ।रचना।

जिंदगी की कड़ी धूप में छाया देते हुए,
इस धरती पर ईश्वर का  रूप हैं पिता,
घर परिवार के  रक्षा के लिए रहे तत्पर,
वीरता के प्रतीक गुणों के कूप  हैं पिता।

हर  संकट से अकेले ही जूझते रहने वाले,
गिरते संभालते और  उठ कर चलने वाले
पर किसी से कोई शिकायत ना करने वाले,
त्याग, सेवा और बलिदान के रुप हैं  पिता।

जीवन नैया के खेवैया बस  वही  अकेला,
  बिना पतवार के पालनहार  वही अकेला,
बच्चों  के आदर्श और उम्मीद वही अकेला,
अपने आप शाश्वत और अपरंपार हैं,  पिता।

परिवार की  साहस और विश्वास उन्हीं पर,
  बाल बच्चों  के जीवन की आस उन्ही पर,
अनभिज्ञ ही रहे जब तक छत्रछाया सर पर,
खोया तब जाना की एक संसार हैं,  पिता।

समय ने ली  करवट  मैं भी बन गया पिता।
जवानी ने दामन झटका और आया बुढ़ापा।
उंगली पकड़  सिखाया था  जिनको चलना,
कल मेरा सहारा बनेंगे सोचते यही हैं,  पिता।

    

                 ✍️     दामोदर मिश्र बैरागी,
                    मेदिनीनगर,  पलामू,  झारखण्ड।

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#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
#जय_माँ_शारदे
#मंच_को_नमन
#विषय: पिता
#दिनांक : 29/10/2020
#दिन : गुरुवार
#विधा : कविता

हमारे  पिता  हमारे  लिए  पालक हैं,पोषण हैं,पारिवारिक अनुशासन हैं,
हमारे  पिता  हमारे जीवन  के  संबल  हैं ,सुरक्षा है ,प्रेम  का  प्रशासन हैं..
एक  दिन  आकाश  से  धरती पर  हो  रहा  था श्वेत हिमपात,
हमारी कपड़ों से  सुरक्षा करते  वे  खुद  झेल  रहे  थे  हिम  का आघात..
दुबली  काया,बरगदी छाया वे  हमारे  लिए एक  फरिश्ता हैं!!

वे  मुश्किल  की घड़ियों में  अक्सर  हमारे  साथ  खड़े  हैं,
हमारी  लाख  कमियों  के  बावजूद वे  पूरी  दुनिया  से  लड़े हैं..
सारे  संसार  ने  माँ  की  ममता  को  तो स्वीकारा  है,
पर  पिता  की  परवरिश को  कब  किसने  ललकारा  है..
उनकी  हिम्मत  हमारी  ताकत है वे  ही  हमारे  अन्नदाता हैं!!

उनके  हौसलों  ने  कभी  ना  हमारी  आँखे  नम  होने  दिया,
ज़ितनी  थी  ज़रूरतें हमारी  सब  तो  उन्होनें  पूरा  किया..
उनके  ज़ज्बों की  बदौलत मुश्किलों से  लड़ लेंगें  हम,
ज़ब  तक  सर  पर  उनका  साया  जो  चाहे  कर  लेंगें  हम..
अपने  पिता  के  चरणों में शत -शत नमन् वे  हमारे 
जीवनदाता हैं!!

✍️  आभा सिंह
लखनऊ उत्तर प्रदेश
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिमबंगाल_इकाई
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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#मंच को नमन
#विषय:#पिता
#गुरुवार:29/10/2020
#विधा#कविता

*पिता*

पिता,
एक उम्मीद,
एक आस है
परिवार की हिम्मत
और अटूट विश्वास है !
पिता,
हौसले की,
दीवार,
संघर्ष में,
आत्मविश्वास है!!
पिता,
परेशानियों से,
लड़ने का हथियार है
जिम्मेवारियों की खान है!
पिता,
परिवार के रथ,
का सारथी कृष्ण है वो
सब संकट दूर करने में,
महारथी है वो!!
पिता,
का साया जिसके
ऊपर वह सबसे
खुशनसीब इंसान है वो !

✍️  शिवशंकर लोध राजपूत
Shivs6203@gmail.com

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नमन मंच 🙏

#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
#विषय_प्रवर्तन
#दिनांक-29/10/2020
#दिन-गुरुवार
#विषय-पिता
विधा-संस्मरण

  बात उन दिनों की है जब मै छुट्टियों मे घर आयी। बहुत सालों बाद घर में सबको देखा सबसे मिली। बहुत अच्छा लगा। माँ ने मेरा खाना मन पसन्द का बनाया था। माँ से मै गले लिपटकर मिली ।वही आँगन मे सीढ़ियों पर बैठकर माँ अपने गोद मे मेरा सर रखी और अपने हाथो से मेरे सर को सहला रही थी ऐसा लगा मानो इतने सालों की यादें एक पल मे ही सारी जी ली मैने। वही नजर जब पिताजी पर पड़ी जो बाहर खड़े गड़ीवाले को पैसे दे रहे थे, माँ की बातों मे इस कदर खोयी रही की पिताजी को देखती रही और ध्यान बातों पर रही। पैसे देने के बाद गड़ीवाला चला जाता है और सामान को वही दरवाजे पर रख देता है। मै तुरंत खड़ी हुई तभी देखा की पिताजी मेरा सामान एक सर पर रख कर और एक कंधे पर टांगे और एक सामान दूसरे हाथों में लिए लड़खडाते हुए अंदर चले आ रहे थे। उनकी लड़खडाते हुए कदमों और कांपते हुए हाथों को देखकर मन भावुक हो उठा और आँखे सहसा नम सी हो गयी। उस वक़्त अहसास हुआ की जो कंधे इतने मजबूत रहे, जिन कंधो पर सारा उम्र बिता जो एक चट्टान की तरह हर मुसीबतो मे खड़े रहे आज वो मजबूत बाजुएँ बुढी हो गयी है, उस वक़्त एहसास हुआ की जो अबतक बोझ उठाते रहे हमारा और अभी भी उठा रहे वो पिताजी आज बूढ़े हो गए। तब मैंने यह निश्चय किया की उनके साथ ही रहूँगी उनका सहारा बन और उन्ही के साथ अपनी सारे काम करूँगी क्योकि माँ- पिता बार बार नही मिलते।हमें अपने और दुसरो के भी आदरणीय पिताजी का सदैव ही आदर और सम्मान करना चाहिए।

!!धन्यवाद!! 🙏

✍️  सरिता श्रीवास्तव,
आसनसोल, जिला- बर्धमान,पश्चिम बंगाल

#साहित्य_संगम_संस्थान

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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल ईकाई नमनमंच
#दिनांक 29/10/2020
दिनांक गुरुवार
#विषय पिता
#स्वैच्छिक
शीर्षक पिता
संस्कृत में पिता ज़ी जनक, पितृ, तात कहलाते हैं,
पिता ज़ी परमपिता, राष्ट्रपिता
बन जाते हैं।
पिता ज़ी महान होते हैं,
पिता ज़ी भगवान होते हैं,
संतानों के प्राण होते हैं।
पिता ज़ी ज़ीने का रास्ता दिखाते हैं,
पितानिराशा में आशा ज़गाते है,
अंगुली पकड़ कर चलना सीखाते है।
पिता जी बच्चों को इंसान बनाते हैं,
अपने बच्चों को भोज़न कराते हैं,
खुद भूखे सो ज़ाते हैं,
कितने पिता को मैने वृद्धाश्रम ज़ाते देखा है,
सभी बच्चों को संदेशा है मेरा
बूढ़े पिता को वृद्धाश्रम नहीं ज़ाने देना,
घर में ही दवा पानी भोज़न देना,
पिता शब्द महान है,
पिता ज़ी को नमन है मेरा
पिता ज़ी भगवान होते हैं।
मौलिक अप्रकाशित स्वरचित रचना

✍️  दलीप कुमार झा
फोर्ट ग्लास टर विद्यालय हाबड़ा पश्चिम बंगाल

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नमन मंच संगम संस्थान र्पाश्चम बंगाल ईकाई
विषय _ पिता
तिथि _ २९/१०/२०२०
विधा _ काव्य

पिता से मेरा नाम है
पिता ही जग में भगवान है
जिसने हमको पाला पोषा
उनकी चरणों में शाम है

पिता ने सुख दुख झेला
औलाद की सुन्दर
परिवरिश है किया
खुद भुखा रह मजदूरी कर
दर्जन भर औलाद को खुशी दिया

उनकी सोंच अति निराली
औलाद की खुशी में
पिता की खुशियाली
बच्चे जब हैं खुशी हरी
उनकी दिल दिखा हरी भरी

पिता देव समान है
पिता औलाद का भगवान है
पिता की आर्शिवचन जो पाये
पूतो फले दुध नहाये

पिता की स्नेह छतरी है
पिता है तो हमारी धरती है
जिसने दिया अपना नाम
नहीं मांगता इसका दाम

जरूरत है इनको सहेजने की
वृद्धावस्था में सेवा भाव करने की
वृद्धाश्रम में ना इनको भेजो
बाल गोपाल संग इनको सेवो

✍️  उदय किशोर साह
मो० पो० जयपुर जिला बाँका बिहार
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल ईकाई
विषय :- पिता
दिनांक :- 29/10/20
विधा :- कविता
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परम पिता परमात्मा सबका
पिता कहलाये ।
जन्म दाता पालन कर्ता पिता
गोद खिलाये ।।
अपना सब कुछ लुटा संतति
पर जीवन अपना वारे ।
पढा लिखा कर शान से उसका
जीवन सदा संवारे ।।

कोल्हू कैसा लगा रात-दिन पिता
भविष्य बनाये ।
अपना ख्याल खुद नही रखता है
सबके लिए कमाये ।।
पूरी जिम्मेदारी को निभाकर सब
की मुराद करे पूरी ।
सबके भविष्य की खातिर करता
भारी-भरकम मजदूरी ।।

करते-करते थक जाता है फिर भी
ना नही करता ।
सुखी रहे संतान हमारी काल से भी जा टकराता  ।।
हर मुसीबत को सिर पर लेकर सदा सरल मुस्काता ।
बच्चो की परवरिश में कोई लापरवाही नही दिखाता ।।

एक आदर्श पिता बनकर के सबको काम दिलाता ।
संतानों की देखभाल कर सबको सुखी बनाता ।।
अपने तन को भूल रात-दिन बच्चों
को योग्य बनाता ।
अपनी तरफ से कोर कसर में कमी नही करपाता ।।
***********************
✍️   सीताराम राय सरल
टीकमगढ मध्यप्रदेश
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# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल ईकाई
# विषय -पिता
# दिनाँक -29/10/2020
# दिवस -गुरूवार
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*****पिता****
पिता शब्द में ही मार्गदर्शन का समावेश है ,
उसके नस नस में कर्मठता सहनशीलता का आवेश है |

कर्म पथ का विशुद्ध पथगामी है ,
परिवार के सुख दुःख का सहगामी है |
झंझावातो और तूफानों में सदा मुसकुराता है ,
दुखों के सागर को अकेला ही पी जाता है |

परिवार को सम्भालने में खुद ही बिखर जाता है ,
किसी पर भी तनिक आंच आने नहीं देता है |
सुख की आस में हरदम जीता है ,
दुख के गरल को हंस हंस कर पी जाता है |

अपने अरमानों का  बेरहमी से गला घोंट देता है ,
बच्चों की खुशियों में अपनी खुशियों को ढूंढ लेता है |
स्वार्थी दुनिया में अक्सर छला जाता है ,
अपना घर छोड़ बृद्धआश्रम में जगह पाता है |

सम्मान की जगह जब अपमान पाता है ,
रेत के महल सा पल में बिखर जाता है |
आइए मिलकर उनके आगे के जीवन का रक्षक बने ,
जो कभी हमारे रक्षक थे उनका आजीवन संरक्षक बनें |
*********************
✍️  एम. एस. अंसारी (शिक्षक)
कोलकाता- 24
पश्चिम बंगाल
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साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
नमन मंच
विषय -पिता
गुरुवार-29/10/2020
विधा -स्वतंत्र

पापा!
तुमसे मिलने ..
मैं रोज रात को
छत पर आती हूँ।

तुम भी बोलोगे ,
"भला क्यों ,
तस्वीर देख लो ।"

"नहीं पापा !"

"जैसे तुम ..
स्नेह की वर्षा करते हो ना ,
वैसे ही चाँद सितारें भी हैं ।
मूक होते हुए भी
स्नेह वर्षा करते हैं ।"

"और मैं उन्हें अपने आँचल में
समेट लेना चाहती हूँ।
बस..समेट लेना चाहती हूँ।"

✍️  वर्तिका अग्रवाल
वाराणसी
उ.प्र.

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#सहित्यसंगमसंस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय-पिता
#विधा-स्वैच्छिक

बुजुर्ग होते पिता ,मित्र बन जाते हैं
अनुभव की भट्ठी में तपे हुए वो
अपने अनुभव को सांझा करते हैं।
नही थोपते निर्णय अपना,
बस मार्ग अपने नजरिये से सुझाते हैं।
हालाँकि कभी कभी कल और आज में सामंजस्य नही बिठा पाते,
मगर फिर भी समझौतावादी हो जाते हैं।
बुजुर्ग होते पिता जो सख्त थे कभी नारियल की तरह सहज हो जाते हैं।
छोटी छोटी बातों से खुश हो जाते वो,
थोड़ा सा ध्यान और प्यार से पिघल जाते हैं,
बुजुर्ग होते पिता एक मित्र बन जाते हैं।
अपने ऊपर खर्च करना अब भी फिजूलखर्ची लगती उन्हें,
मगर बच्चों द्वारा दिए गए उपहार में वो प्यार छुपा पाते हैं।
जिम्मेदारियों को निभाते हुए सारा जीवन बिताने वाले,
जिम्मेदारी से मुक्त होकर सुकून बड़ा पाते हैं।
खुश होते बच्चों की प्रगति से,
मगर अपनी खुशी नही दिखाते हैं।
अभी भी फिक्र उतनी ही रहती बच्चो की,
जब तक बच्चे घर न आ जाये तब तक चैन नही पाते हैं।
बुजुर्ग होते पिता एक मित्र बन जाते हैं।
प्यार दिखाने में अभी भी सहज नही होते वो,
माँ को ही वो माध्यम बनाते हैं।
तकलीफ में देख बच्चों को सुकून से नही रह पाते हैं,
कितना भी बड़े हो जाये संतान उनकी
बस बच्चे ही समझते रह जाते हैं।
बुजुर्ग होते पिता मित्र बन जाते हैं।
बरगद के पेड़ की तरह होते वो,
जमाने की आँच से अब भी बचाते हैं,
बुजुर्ग होते पिता मित्र बन जाते हैं।

✍️  रूचिका राय ,
सिवान बिहार
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#नमन_साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई
#विषय_प्रवर्तन
#दिनांक - २९/१०/२०२०
#दिन - #गुरुवार
#विषय - #पिता
#विधा - #कविता
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मां अगर ममता का आँचल, पिता आसमान है।
पिता पालक, पिता रक्षक, पिता स्वाभिमान है।।

पिता है एक ठंडी छाया, पिता निर्मल प्यार है।
त्याग का प्रतिरूप है और पिता ही संसार है।।

पिता है सूरज की गर्मी, पिता शीतल चाँदनी।
पिता धीरज, पिता पर्वत, पिता निर्झर रागिनी।।

पिता है जीवन का वैभव, पिता एक कुम्हार है।
पिता है आधार घर का, पिता दृढ़ दीवार है।।

पिता है जीवन का दर्शन, पिता जीवन प्राण है।
पिता संयम और समर्पण, पिता साहस गान है।।

पथ प्रदर्शक, अटल साधक पुण्य का परिणाम है।
प्रेरणा के स्रोत शिल्पी पुरूष को प्रणाम है।।

✍️  रिपुदमन झा 'पिनाकी'
धनबाद (झारखण्ड)
स्वरचित
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#साहित्य_संगम_संस्थान_नमन_मंच
#विषय_पिता

पिता है सृष्टि का अनुपम सुखद उपहार।
पिता है तो मिलता  अद्भुत सुख अपार।

संसार में पिता रहने से पूरा रहता परिवार।
बच्चों के लिए पिता की महिमा अपरंपार।

रहता बच्चों के सर पर पिता का साया।
मिले कड़ी धूप में पिता से शीतल छाया।

पिता हर कष्ट सहकर बच्चों को पालता।
बच्चों की हर फर्माइश पूरी करना चाहता।

छोटी-मोटी तकलीफ में माँ को याद करते।
बड़ा कष्ट आने पर सदा पिता ही याद आते।

किन शब्दों में करु मैं  पिता का  गुणगान।
क्योंकि सृष्टि में कोई नहीं है पिता से महान।

माना माँ होती है हमारे इस जीवन की धुरी।
बच्चों को साथ पिता का भी बहुत जरूरी।

पिता के पास बच्चे की खुशी का खजाना।
चाहिए  नित उठ  पिता को  शीश नवाना।

पिता से मिलता बच्चों को सदैव सुंदर ज्ञान।
पिता के पास होता हर समस्या का समाधान।

पिता अपने बच्चों के लिए सर्व शक्तिमान।
पिता ही है हमारे जीवन में आदर्श इंसान।

पिता का है हमारे जीवन में सबसे ऊँचा स्थान।
पिता से ही होती है हमारे जीवन की पहचान।

पिता पर करते है सदा हम सब अभिमान।
पिता की वज़ह से ही होती जिन्दगी आसान।

पिता नहीं होने से जिन्दगी में हर वक़्त इम्तिहान।
पिता जताते नहीं अहसान पर रखते हमारा ध्यान।

हमारी गलतियां को करते सदा नजर अंदाज।
अच्छाई पर कहते मेरे बच्चे है बड़े जांबाज।

अपनी ख्वाहिशें दबा,पूरे करते हमारे अरमान।
हर पिता के लिए अपना बच्चा उनकी जान।

✍️   कलावती कर्वा
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नमन मंच
#साहित्य_संगम_संस्थान

विषय....मेरे पापा

क्या लिखू मैं
पापा के लिये
जिन्होने खुद
मुझे लिखा है।

क्या मांगू मैं
अपने पापा से
बिन मागें ही मुझे
सब कुछ मिला है।

क्या गिले-शिकवे करू
मै अपने पापा से
पापा के रूप मे
मुझे भगवान मिले है।

क्या तारीफ करू
मै अपने पापा की
हर मुश्किल मेरी
आसान कर देते है।

भगवान सलामत रखे
मेरे पापा को क्योकि
मेरे पापा में.....
मेरी जान बसती है।

✍️  डॉ. आकाश राठौड़
रामनगर गौसाई
जिला बिजनौर
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#साहित्यसंगमसंस्थान पश्चिम बंगाल
दिनांक-29/10/2020
विषम-पिता
पिता .....
वह भी जन्मदाता है
पर  दर्द दिखाता नहीं है
पिता माँ नही है
मगर ममता मे माँ से
कम नही होता
पिता वृक्ष बरगद है जो
अपनी शाखाओं को
मजबूत जड़ों का स्वरुप
देता  है
फैलती शाखाओं का जो
आधार स्तंभ होता है
पिता दरख्त- ए -नीम है
स्वाद कड़वा हो भले
पर छांह ठंडी देता है
जिसके होने पर हम
सुकून की नींद सोते हैं
जिसकी छांह तले
सपने हम बुनते हैं
पिता है तो बच्चों का
निश्चिंत बचपना है
घर का सुरक्षित
हर कोना कोना है
त्योहारों पर खिलौना है
पिता बच्चो की
फरमाइशों की लिस्ट
उनकी उम्मीदों की
फेहरिस्त होता है
हर बच्चे के सर पर
पिता का हाथ
सुरक्षा कवच होता है
बच्चे हो जाते हैं बड़ै
अपने परों को फैलाए
आसमान नापने
उड़ जाते हैं .......
तब  पिता को
भरोसा होता है
हमारे मजबूत पंखों पर
जो आधार बनते हैं
उनके झुर्रियों भरी
उम्मीदों भरी चेहरे की
जब वही बूढे हाथ
कांपने  लगें और
कदम डगमगाने लगे
हम थाम लें बढकर
पिता का निर्बल हाथ
भरें हम सतरंगी रंगों मे
जीवन के रंग पिता के संग
चलें उनके कदमों के संग
हम  पाते रहें जीवन भर
स्नेह सिक्त दुआओं का साथ

    ✍️ मोनिका प्रसाद
********Monika Prasad
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#साहित्य_संगम_ संस्थान_ पश्चम_बंगाल_ इकाई
#जय_माँ_शारदे
#विषय :पिता
#दिनांक 29/10/2020

पिता
पिता एक ऐसा रिश्ता है
जो सब रिश्तों से बड़ा है !
पिता ही है जो दुनिया में
बच्चों के लिए सबसे लड़ा है !
पिता एक बरगद का पेड़ है
जिसकी छावं में बच्चे पलते हैं !
पिता ही वो सूरज है
जिससे हज़ारों दीपक जलते हैं !
पिता एक नन्हे से बच्चे की बड़ी उड़ान है
पिता जिसके पास है उसके लिए अपना सारा जहान है !
पिता है तो सब मुश्किल आसान है
पिता है तो बच्चा कठिनाइयों से अनजान है !
पिता के कंधो पर मखमल सा अहसास है
पिता है तो पुरे जहान की
खुशियां आस पास है !
पिता इस भवसागर की नैया है पतवार है
पिता ही  बच्चों का पालनहार है !
पिता है तो बच्चे के पूरे सब सपने हैं
पिता है तो बाजार के सब खिलौने अपने हैं !
पिता हरी दूब है,मखमल है ,बिछौना है
पिता ही से तो हर सपना सलोना है !
पिता ख़ुशी है प्यार है पिता ही सलाहकार है
पिता के बिना सब कुछ बेकार है !
पिता है जो जिम्मेवारी निभाता है
बच्चों का कहा कभी टाल नहीं पाता है !
पिता कभी ऊँगली पकड़ कर घूमाता है
पिता कभी पीठ पर बिठाता है !
पिता है जो पानी में खुद भीग जाता है
पिता है जो बच्चों को भीगने से बचाता है !
पिता है जो खुद रूखी सुखी खाता है
पर बच्चों को भरपेट खिलाता है !
पिता खुद  पुराने कपडे पहनता,बच्चों को नये पहनाता है
पिता बच्चों की ख़ुशी के लिए बरसात व् धूप में पसीना बहाता है !
पिता एक स्तम्भ है जो हमेशा मजबूती से खड़ा है
फिर आज ऐसा क्या हो गया कि पिता बृद्धाश्रम में पड़ा है !
पिता के खून पसीने की कमाई नालायक बेटा खा गया
और बाप को जीते जी मार कर बृद्धाश्रम पहुंचा गया !
कारों में सफर करने वाले अब बसों को ताकते हैं
जेब में एक पैसा नहीं रखा बेटों ने,सड़कों की धूल फाँकते हैं !
पैसों की खातिर आज बर्बाद हो गया
सिंघानिया जैसा सेठ भी लाचार हो गया !
संस्कारों की अब यह नई परिभाषा नज़र आ रही है
समझ नहीं आ रहा यह दुनियां किधर जा रही है !
पिता की जीते जी जो कदर नहीं है करता
याद रखना दोस्तो बाद में वह भी तिल तिल है मरता !
इसलिए जीते जी पिता की कदर करो
बुढ़ापे में उनकी लाठी बनो जिंदगी उनके नज़र करो !
बाद में श्राद्ध करने से कुछ नहीं होगा
झूठ फरेब व दिखावे से कुछ नहीं होगा !
पिता जब नहीं होगा बहुत पछताओगे
इस दुनिया में अकेले रह जाओगे !
फिर ना कोई सलाह होगी ना कोई सलाह देने वाला
पिता को याद करोगे पर कोई नहीं होगा सुनने वाला !
क्यूंकी पिता की दुआओं व् आशीषों को कोई पाट नहीं सकता
उनको इंसान तो क्या भगवान् भी काट नहीं सकता !

✍️  रवींद्र कुमार शर्मा
घुमारवीं
जिला बिलासपर हि प्र
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🙏💐नमन मंच #साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
विषय-#पिता
विधा-काव्य
स्वरचित
समीक्षा हेतु
"पिता"
बरगद की शीतल छाया से होते है पिता।
सुविधाओं के बीज शान से बोते है पिता ।
ख्वाब सुनहरे पलकों पे व फलक में उडता मन,
चितवन नाचे मयूरा सा चमक उठे रुपैली किरन।
बढता पौधा चढता सूरज मुस्काता है ऑगन,
भँवरे,तितली,नदियॉ झरने,रंग बिरंगे खिले सुमन।
परी देश के अश्वो के पँखो पे जब होते है,
कायनात के चॉद सितारे सब मुठ्ठी में होते है।
सब आशअभिलाश,हसरत पूरी वो ही करते है।
कल्पनाओं में हकीकत के रंग भरते है पिता ।
प्यार भरा होता है मन में नेनों में स्नेह धारा,
गर्व,फर्ज, अधिकार के मानक व पालनहारा ।
सुख सारे न्यौछावर कर दुख खुद के दामन में लेते,
पर दगा और आघात नही सह पाते है पिता।
होता,अभिमान पिता को बालक नाम कमाते है,
कामयाबी के दिये जले तो फूले नही समाते है।
पर बेगैरत संतानें कभी नीलाम मान को करते है,
शर्म,हया, लज्जा,लाचारी से शीश नवाते है पिता ।
ममता मोह प्रेम मे सराबोर से रहते है पिता ।
खुशियों की परछाई बन संग रहते है पिता ।

      ✍️        सुशील शर्मा
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नमन 🙏 :-  साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
विषय :- पिता
विधा :- कविता

हम रोशन , आप पिता मेरे भगवान है ,
हमेशा आपकी सेवा करूं , यही हमारा ध्यान है ।
आपकी पूजा पाठ से ही , हमारा मान सम्मान है ,
हम पुत्र आपके धनुष तो पिता आप बाण है ।

साईकिल रिक्शा, रेल और विमान है ,
बढ़ता हुआ कला और विज्ञान है ,
आप ही मेरे आन - वान और शान है ‌।
आप ही बोये बीज तब हम आज चमकता हुआ धान है ।।

दुनिया तंग पर हम न परेशान है ,
ये पिता जी आपकी एहसान है ।
तब हमारे पास कुछ ज्ञान है ,
जिससे ज़िन्दगी जीने की अभियान है ।

बाद में रामायण, महाभारत, गीता, बाइबल और कुरान है ,
सच में पिता जी माँ के बाद आप ही मेरा भगवान है ।।

✍️  रोशन कुमार झा
सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज कोलकाता,
ग्राम :- झोंझी , मधुबनी , बिहार
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🔷पिता 🔷
पिता कहो दादा कहो या पापा कहो श्रीमान
घर  का  गौरव  है  सदा  पिता से है सम्मान
रक्षक  है  परिवार का  है घर  का आसमान
हर  संकट  को  झेलता  घर का  है भगवान
🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶
जिन कंधों पर बैठकर  देखा ऊंचा आसमान
उन कंधों को झुकने  ना दे हे पुत्र वही महान
जन्म समय तेरे पास था चलना तुझे सिखाएं
अंत  समय तू  साथ दे  अपना फर्ज  निभाए
🔷🔷🔷🔷🔷🔷🔷🔷🔷🔷🔷🔷
चिंतन करता था सदा तनय को आंच ना आए
मेरे  बाद भी  पुत्र  पर  तनिक ना  संकट आए
पुत्र  की  खुशहाली  का  चिंतन जिसको भाए
अंत समय में पुत्र पिता के तन को आग लगाए
🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶🔶
                   🔷साहित्य मित्र 🔷
            ✍️   विधानाचार्य ब्रःत्रिलोक जैन
                  बर्णी गुरुकुल जबलपुर
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#साहित्य संगम संस्थान,पश्चिम बंगाल इकाई
विषय:पिता
विधा:स्वैच्छिक
विषय प्रदाता:आ रोशन कुमार झा जी
विषय प्रवर्तन:आ  मिथलेश सिंह मिलिन्द जी
दिनांक:29-10-2020

#सपने में पापा ने उठाया
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सपने में
पापा ने उठाया,
प्यार से गले लगाया
बोले रात को क्या करते हो?
इतनी देर तक सोते हो?
तुमको प्यार से वर्षो समझाया
सूर्य के प्रथम किरणों में
छत पर ध्यान लगाओ
सूर्य नमस्कार ना सही,
ऐसा ही कुछ प्रयास करो
सुबह शीघ्र उठो और
अपना काम करो,
तुम पुरानी बातों को भूल गए
स्थापित आदर्शों को भूल गए
ना यह भान रहा,
ना ख्याल
अपने पापा के अरमान का,
ना अहसास रहा अपनी जिम्मेदारी की
बुढ़ी माँ,बच्चें,पत्नी
और परिवार के अन्य सदस्य का,
किसके भरोसे हैं सारे  के सारे ?
अब मैं भी ना रहा जो
तुम्हारे आल्स्यपन  पर,
अपनी कर्मठता का मरहम लगाऊं
तुम आज भी पहले की भांति
बातों को टालते हो,
गोल गोल बातों से मुझे
बहलाते हो,
अरे,पूरा जीवन पड़ा है
लेकिन तू आज भी ,
अपने भरोसे नहीं खड़ा है
मुझे तुझसे,
जिम्मेदारी का अहसास  ही नहीं
हर पल जीने का
नये नये आभास भी चाहिये।
हर पल
                ✍️  श्रीकृष्ण चंद्र श्रीवास्तव
                   खान मंत्रालय
                   भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण
                   कंकड़ बाग,पटना,बिहार-20
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# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल
नमन मंच
विषय -पिता
विधा- आलेख
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पश्चिम बंगाल इकाई पर जब मैंने यह पोस्ट देखा,
मुझे लगा कि यह तो बहुत आसान विष यहै lपर जब कागज और कलम लेकर में बैठी तब मेरे शब्द न जाने कहां गुम हो गए?  पिता को शब्दों में बांधना मेरे लिए आसान नहीं था lकहते हैं  पिता का कद आसमान से भी ऊंचा होता हैl ऊपर से कठोर दिखने वाले पिता के हृदय में, अपने बच्चों के लिए अथाह प्रेम भरा होता है  lकोई कहता है कि पिता हम से प्रेम नहीं करते किंतु ऐसा सोचने वाले गलत सोचते हैंl
मैं अपने पिता के गोद में ही खेल कर बड़ी हुई, माताजी गांव में रहती थीl हमें कभी माता की कमी नहीं खलती थी,  पिताजी वह  सभी काम करते थे जो मां को करना चाहिए,  मेरे बीमार होने पर उन्हें बेचैन होती भी मैंने देखा है lबिना कुछ परवाह किए गोद में उठाकर अस्पताल दौड़ जाना,  यह उनके कोमल हृदय को दर्शाता हैl बोर्ड की परीक्षाओं में मैं जब रात को पढ़ती थी, अकेली डर न जाऊं,  मेरे साथ रात भर जगा करते थेl मुझे इसका एहसास तक ना थाl मेरी हर परेशानियों को दूर करने का भरसक प्रयास करते थेl खुद के कपड़े कंधों से फटे होते थे,  लेकिन हमारे लिए नए कपड़े लानाl कहीं बाहर से आते,  खुद दिन भर भूखे रह,  जाते लेकिन हमारे लिए मिठाइयां लाना नहीं भूलते थेl परिवार के विरोध के बावजूद मुझे अच्छे स्कूल व कॉलेजों में पढ़ाना, मुझे अपने पैरों पर खड़ा करने  के लिए जी जान लगा देना l
       पिता बनना इतना आसान नहीं lबच्चों को पढ़ाना  लिखाना,  उन्हें हर सुविधा उपलब्ध कराना ,  गलत आदतों से बच्चों को बचाना,  और न जाने कई जिम्मेदारियों का बोझ ढोते हैंl पर  उफ़ तक नहीं करतेl
      पिता के भावनाओं को बयान करना मेरे बस की बात नहींl

यह लेख मेरे पिताजी को समर्पित

✍️ चंद्रमुखी मेहता
जिला बलरामपुर छत्तीसगढ़
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नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान, पश्चिम बंगाल इकाई
विषय: पिता
दिनांक:29\10\20
विधा: कविता
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पापा आप क्यों चले गए?
जाते जाते हमें गम में डूबो गए,
मेरे जीवन की हर सुबह,
सुबह की हर किरण,
जीवन को अंधेरा कर गए,
पापा आप क्यों चले गए?
जाते जाते हमें गम में डूबो गए।

मौसमों का खिलता वसंत,
उस वसंत की बहार,
पतझड़ सरीखे हो गए,
पापा आप क्यों चले गए?
जाते जाते हमें गम में डूबो गए।

आपको मैं चारों दिशाओं में ढूंँढती,
घर के हर कोने में आपकी आवाज़ है गूंँजती,
अंधेरा ही अंधेरा है जीवन,
दिशाएंँ भी अंधेरी गली जैसी दिखती,
पापा आप क्यों चले गए?
जाते जाते हमें गम में डूबो गए।

रातों को नींद ना आए,
माँ की सूनी मांग दिल को तड़पाए,
वो पागलों जैसी हरकतें करती है,
घर अंँगना में आपको खोजती फिरती है,
जागी आंँखों से सपने देखती हूंँ
घर के किसी कोने में आप छिपे होंगे,
इसी भ्रम में जीती हूंँ,
पापा आप क्यों चले गए?
जाते जाते हमें गम में डूबो गए।

जिससे अब कभी छुटकारा ना मिलेगा,
जीवन का एक बड़ा हिस्सा हो गया अंधेरा,
वहां अब कभी उजाला ना मिलेगा,
मुझे आपका चेहरा याद आता है,
करती थी सवारी आपके कंधों की,
वो कंधा मुझे बहुत याद आता है,
जब भी देखती हूंँ तस्वीर आपकी,
जार जार रोने का मन करता है,
माँ को देख कर चुप रह जाती हूंँ,
आंँसूओं को अपने मैं पी जाती हूं,
पापा आप क्यों चले गए?
जाते जाते हमें गम में डूबो गए।
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✍️  अभिलाषा "आभा"
गढ़वा (झारखंड)

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#साहित्यसंगमसंस्थान #पश्चिमबंगालइकाई
#दिनांक-29/10/2020
#विषय-#पिता
#विधा- #स्वतंत्र. कविता

           🌹#पिता#🌹

पिता वही जो पालक बन, घर परिवार चलाता है,
.परमपिता परमेश्वर को  भी ,पिता कहा जाता है।
हम  सब बच्चों के,पिता ही जन्मदाता हैं,
हम सब की परवरिश कर ,पिता ही  लाड़ लडाता है।
पढ़ा लिखा कर शान से ,जो जीना हमें सिखाता है,
फरमाईश हम सबकी, जो पूरी  करता रहता है।
पिता हमारे जीवन दर्शन ,पिता हमारे प्राण हैं,
पिता हमारे पालक ,रक्षक ,पिता ही स्वाभिमान है।
पिता हमारे घर के आधार, पिता एक मजबूत दीवार है,
पिता बिना घर सूना सूना ,पिता हमारी शान है।
पिता पथ प्रदर्शक मेरे,  प्रेरणा के वो स्रोत हैं,
पिता का साया ठंडी छाया , पिता का प्यार मूरत है।
पिता हमारे त्याग समर्पण की, साक्षात प्रतिमूर्ति हैं,
पिता के पद चिन्हों पर चलकर, मिलती मुझको पहचान है।
मै अपने पिताजी की लाडली, माता-पिता दोनों मेरी जान है,
हम बच्चों पर  करते वो, अपना तन -मन- धन न्योछावर हैं।
ऐसे मात पिता दोनों को,मेरा बारंबार प्रणाम है।।

✍️ रंजना बिनानी
गोलाघाट असम
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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय- पिता

🌹 *मेरे पापा* 🌹

पापा   मुझको  गोदी  लेकर
    खींचो  फिर  सुन्दर  तस्वीर..
जिस दिन से मैं बड़ी हो गयी
    रूठी  सी   लगती  तकदीर..

बचपन खोकर बड़ी हो गयी
    जिद  लड़ाना  गयी मैं भूल..
जिस बगिया के तुम थे माली
    उस उपवन  का मैं हूँ फूल..

छूट गये  सब  रिश्ते  नाते
    दूर  हो   गया  है  परिवार..
एक बार निज गले लगाकर
    कर देना मुझ पर उपकार..

पापा याद बहुत आती है
    भर  आता  नैनों  में  नीर..
तुम्हीं दिलाते मुझे हौसला
   तुम्हीं मिटाते दिल की पीर..

मिल जाये जो बचपन वापिस
    पाऊँ   फिर   से  तेरा  प्यार..
मस्त  अँगन  में   दौडूं  खेलूं
    फिर से  पाऊँ  लाड़  दुलार..

पापा तुम तो रहो सलामत
    जब लों गंग यमुन की धार..
जब तक सूरज चंदा चमके
    मुझे   चाहिए   तेरा  प्यार..
         
          ✍️ *गुँजन शुक्ला*
       औरैया- उत्तर प्रदेश
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#साहित्यसंगमसंस्थानपश्चिमबंगालइकाई
#पिता
#विधा-स्वतंत्र

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शान मान और अभिमान हैं पापा ।
मेरे जीवन की पहचान हैं पापा ।
पापा है तो हर सपने अपने,
हर मुश्किल का आसान हैं पापा।
~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•
जर ज़मीन ज़ागीर हैं पापा ।
ईश्वर का ही एक रूप हैं पापा ।
आपका ये कर्ज चुका सकते नहीं,
इतने हम पर तेरे उपकार हैं पापा ।
~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•
मेरी हर समस्या का समाधान हैं पापा ।
हर शौक जो पूरी कर दे वो आप हैं पापा ।
जिनकी साया में रहते हम निडर है,
उस वट वृक्ष की छांव हैं पापा ।
~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•

माँ का सिंदूर बेटी की आस हैं पापा ।
मेरी हिम्मत और उमंग हैं पापा ।
जिसपे पूरा परिवार टिका,
उस घर का विश्वास हैं पापा ।
~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•~•
जो हर कष्ट सहकर भी खामोश रहते इतने महान हैं पापा ।
कभी हारा थका न खुद को समझे ऐसे तो इन्सान हैं पापा ।
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✍️ अभिनव मिश्र"अदम्य
शाहजहांपुर, उत्तरप्रदेश

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#नमन मंच
#साहित्यसंगमसंस्थानपश्चिमबंगालईकाई ।
#दिनांक-29/10/2020
#विषय-पिता।
#विधा-दोहा

***********************************

पिता जगत में होत है,
                          बहुत बड़ा आधार ।
हर विपदा में साथ जो,
                         सदा लगाए पार ।।१।।

**********************************

पिता कि गहरी छांव में,
                        बेटा नित सुख पाय।
बिना पिता के कछु नहीं,
                        जग सूना हो जाय।।२।।

**********************************

जीवन सुखमय होत है,
                         पितु तेरा आशीष।
रखो हाथ नित आपणों,
                       सदा हमारे शीश।।३।।

***********************************

✍️  बेलीराम कनस्वाल
घनसाली,टिहरी गढ़वाल,उतराखण्ड।

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🙏माँ शारदे को नतमस्तक प्रणाम 🙏
🙏मंच को नमन 🙏
#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिमबंगाल_इकाई
#विषय-पिता
#वार-गुरुवार
#दिनांक-29/10/2020
विधा-कविता स्वतंत्रत

                  🙏पिता 🙏

साम-दाम-दंड-भेद के जो हक़दार,
सदैव पिताजी को सादर नमस्कार।

भितर से कोमल बाहर से फटकार,
मेरे पिताजी के  चरणों में सत्कार।

पिता जोश है पिता मेरा हथियार,
सर पर हाथ है जो जीत लू संसार।

पिता के लिए सब कुछ दिया निसार,
माँ नहीं है तो क्या, पिता है उपहार।

दूरसंगती से बचाता पैना औजार है,
पिता नाम  जीवन का दूजा प्यार है।

अंगुली का सहारा जवानी में यार है,
थोड़ा कटु पर खुशियों का भंडार है।

हम छोटे मंत्री-नेता पिता केंद्र सरकार है,
जैसा बचपन में था वैसा अब बरकरार है।

पिताजी से चमकता सम्पूर्ण परिवार है,
हम जो है,जहाँ सब पिता के संस्कार है।

        
            ✍️विकाश बैनीवाल
        हनुमानगढ़(राजस्थान)
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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिमी बंगाल
#विषय - पिता

मेरे जन्म की खबर सुनकर
खुशी से झूमे थे पापा
मुझे अपनी गोद में लेकर
मेरा माथा चूमकर आपने
मेरी उड़ान के सपने सजाए थे पापा

एक कुम्हार जैसे रचता है
सिर्फ गीली मिट्टी को मूर्ति के रूप में
तपाता है,उसे नया आकर देता है
स्वयं के हाथ भी जला देता है
मुझे भी आपने उसी तरह गढ़ा है पापा

अपने सपनों को कुर्बान कर
मेरे सपनों में जुट गए पापा
मेरी कामयाबी की खबर से
मुझसे ज्यादा तो आप खुश थे पापा
आपकी आंखों में नमी देखी है पापा

जब भी मेरे कदम डगमगाए
मेरा हाथ आपने थामा
आप बाहर से थोड़े सख्त थे
पर नारियल की तरह ही
अंदर से बिल्कुल कोमल हो पापा

कैसे भूल जाऊ मैं वो सपना

जिसे बचपन से आपकी
आंखो में जिया है मैने पापा
देखना एक दिन ऐसा आएगा
आपकी बेटी आपका सपना
जरूर पूरा करेगी पापा

   ✍️  जया वैष्णव
जोधपुर, राजस्थान
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#साहित्य संगम संस्थान,पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय:-पिता
#विधा:-काव्य

#नमन मंच

पिता घर का मान सम्मान अभिमान है।
पिता ही हर घर में सबसे  मूल्यवान हैं।।

पिता हर माँ की चूड़ी बिन्दिया की आन है।
पिता ही समाज में परिवार की पहचान है।।

पिता अपने बच्चों का खुला आसमान है।
पिता ही हर घर का शंख और अजान है।।

पिता पालक पोषक और संकट मोचक है।
पिता का झुर्रियों से भरा चेहरा संघर्षों का द्योतक है।।

पिता का ह्रदय एक गहरा राज।
पिता हर घर  का सुनहरा ताज।।

पिता का हाथ जिसके सर पर होता है।
शायद,
पिता विधाता से भी बड़ा होता है।।

सादर:-
✍️  राम प्रकाश अवस्थी,रूह
जोधपुर,राजस्थान🙏

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नमन मंच🙏 साहित्य संगम संस्थान,पं.बंगाल
दिनांक-29/10/2020
विषय-पिता
विधा-वर्ण पिरामिड -धनुषाकार (पद्य काव्य)

शीर्षक-पिता

है
माँ का
श्रृंगार
जनक से
अंबर जैसा
विस्तृत जहान
में प्रेम जनक का
आजीवन कष्टों को
सहता प्रसन्न
रहे तप में
न रखते
ख्वाहिश
कुछ
है
।।
जो
हमें
इंसान
बनाएं वो
जगत में है
पिता ईश तुल्य
पाहन काट पथ
बनाना जो सिखाएं
तपती दुपहरी
काया जलाते
संतान पे
लुटाएं
प्रेम
जो
।।

✍️ सुमन राठौड़
_झाझड_
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#साहित्य संगम संस्थान प.ब.इकाई
विषय-पिता
विधा-छंदमुक्त

पिता
वो शख्स
सपनो की खातिर
जो तपाता खुद को
बेचता स्वयम को
समय की परिधि से बांध
पाने को छोटी मुस्कान
एक उम्मीद
एक आस,घर की साँस
टिका होता घर
पाकर उसका विश्वास
फौलादी ह्रदय
दफन मर्म
सपनो की जान
घर की पहचान
बच्चो का खिलौना
प्यार का बिछौना
हौसलों की दीवार
साहस ताकत और अभिमान
शान ,आन ,मान
रिश्तो की जान
माँ आंखों की ज्योति
पिता आंखों का तारा
पिता से घर की रौनक
माँ के चेहरे की आभा
संघर्ष शील
खाली जेब होते हुए
सपनो की उड़ान पूरी करने वाला
पिता से अमीर
इंसान नही देखा
पिता का प्यार
न समझ सका कोई
उससे हारा
इंसान नही देखा

✍️ मीना तिवारी
पुणे महाराष्ट्र
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नमन मंच 🙏🏻🙏🏻
# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल  इकाई
# विषय  - पिता
# विधा - कविता

पिता मेरे
प्यार का झूला झुलाते
स्नेह अपनत्व से ये भी समझाते
राह कठिन जीवन की
संभल कर तुम्हें चलना है
सहारा मेरा है हरदम
न घबड़ाना है
जीवनपर्यन्त उनका
ये वादा रहता
धैर्य,सच्चाई का दामन न छोड़ना
दूसरों की तकलीफ़ समझो
थोड़े उनके भी काम आना
पिता मेरे
सीख के भाव से सींचते
अपनी परेशानी छुपाते
मुख पर हँसी रखते
पढ़ाते जीवन का पाठ
अनुभवी बनाते
जो माँगें हम
फरमाइश पूरी कर जाते
पर ये भी याद दिलाते
चादर बड़ी जितनी पैर फैलाओ उतनी
मंजिल को पाने की
भरसक प्रयास करो
अपने सुख की तो
तनिक भी उन्हें परवाह नहीं
हमारे लिए जीते
हममें अपनी खुशी ढ़ूढ़ते
ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती
मित्रता का भाव रखते
हम अपनी परेशानी बोले
पहले वो ही समझ लेते
खुशी की बात हो तो
चेहरे उनके खिल जाते
हमारी जरूरत
उम्र भर जो पूरा करते
दुआओं में हमें ही रखते
उनकी चाहत बस इतनी
संतान का साथ बना रहे
पिता मेरे
सीख की पोटली
भावों से भरे
एहसास के सागर
ख्याल खुशियों का हमारे
उम्र भर ही रखते
मेरी दुआ है इतनी
रहमत में रहूँ उनकी
कभी उनका साया न छूटे
रहबर मेरे बनकर वो
हमेशा ही रहे
पूजती उन्हें मैं
उनकी जगह कोई और न ले सके
उनकी सीख हमेशा
याद रखती
फिर मैं अपनी नई दुनिया बसाती

✍️ प्रियंका प्रियदर्शिनी
फरीदाबाद हरियाणा
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#मंच - साहित्य संगम संस्थान पश्चिम
            बंगाल इकाई को प्रणाम।🙏🙏
विषय - पिता
विधा  - काव्य (मुक्तक)
दिनांक- 29-10-2020
कवि   - राजकुमार प्रतापगढ़िया

                  **कविता**

पिता की महिमा, क्या कोई गाये,
पिता में तो संसार समाये।
दुनिया रूपी मरुस्थल में ,
तपा स्वयं छाया बन जाये।।

नौनिहालों का भविष्य बनाने ,
उज्जवल जीवन राह बताने।
थके कदम ले , फिर भी चलता ,
एक नवीन दिनकर नित लाने।।

बाल हठ मुस्कान जगाते ,
आसूँ नैन हालात छुपाते।
आभावों में बेशक जीवन ,
लेकिन बालक कुँवर बताते।।

पिता के त्याग की कीमत क्या ,
समझे ना वो क्या इंसा।
माँ का प्यार तो जग जाहिर है,
छुप-छुप करता प्यार पिता।।

                ✍️    राजकुमार प्रतापगढ़िया
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जय माँ शारदे
नमन मंच
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय -पिता
#विधा -सार छंद
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वो पिता जिन्हें निज सुख, द्रवित ना कर पाया  |
शावक के अनुरागी बन, हृदय पीरा छिपाया ||

अपनी इच्छा त्याग कर वों, शिष्ट प्रेम जगाये |
सुवन की शिक्षा लक्ष्य बना, दाह स्वयं हो जाये ||

पग में पनही धरे नहीं वो, सूत पहरावे जूती |
ऐसे पिता देव चरण परु, पथ दिखे नहीं दुति ||

✍️ स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"(कोलकाता)

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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#विषय _ पिता
#विधा _ कविता

मेरा अभिमान, मेरे जीवन का आधार है पिता
आपसे मिला हमको स्नेह, संस्कार, ज्ञान अथाह

आपसे ही पाया  हमने जीवन का संपूर्ण सार
आपके  चरणों में बसता हमारा सारा संसार

कांधे पर बिठाकर हमको दुनिया को दिखाया
उंगली पकड़कर आपने चलना हमें सिखाया

बिन बोले समझ जाते हमारी हर जरूरतों को
एक पल में पूरी कर देते हजारों ख्वाहिशों को

दुविधा के पलों में विश्वास हमको दिलाया
सत्य और न्याय के पथ पर चलना सिखाया

जिंदगी के सफर में हौसला आपने बढ़ाया
हर कठिन डगर को सरल करके बताया

मुश्किलों का डटकर सामना करना सिखाया
सेवा और संयम का सदा हमको पाठ पढ़ाया

हर परिस्थिति में धैर्य धारण करना सिखाया
दुख के लम्हों में भी हंसकर जीना सिखाया

जीवन के हर पहलू को अपने अनुभव से बताया सफलता का मार्ग दिखा लक्ष्य तक बढ़ना सिखाया

हमारे ख्वाबों की खातिर आपने हर कष्ट उठाया
स्नेह और संस्कार से हमको सफल इंसान बनाया

धरा पर ईश्वर की जीवंत प्रतिमा माता पिता
इनके आशीर्वाद की छाया रहे हम पर सदा

इनकी सेवा मात्र से प्रसन्न हो जाते भगवान
इनके ही चरणों में हैं सारे तीर्थ चारों  धाम।।

✍️  प्रेमलता चौधरी
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#साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम बंगाल_इकाई
#विषय_प्रवर्तन
#गुरुवार - 29-10-2020
#विषय- #पिता
#विधा -स्वैच्छिक (कविता)

धूप इतना ना झुलसाओ मुझको,
प्यास इतना न सताओ मुझको,
आज बहने दो पसीना तन से,
आएँ हाथों में फफोले फिर भी,
हाथ मेरे नही थमने वाले,
रिस रहे हों पैरों के छाले फिर भी,
पाँव थक कर नहीं रुकने वाले,
आज कुछ और कमा लेने दो,
  एक निर्धन का किया बेटी से,
अपने वादे को निभा लेने दो,
आज जन्मदिन है मेरी बेटी का,
एक गुड़िया तो दिला लेने दो।
गले लग जायेगी कहके पापा,
पूरी दुनिया को दिखा आएगी,
बोलकर गुड़िया मेरे लाए पापा,
दर्द मेरे उसी पल मिट जाएंगे।
उसकी आँखों के ख्वाब सजा लेने दो,
आज कर दो फौलाद सा सीना मेरा,
उसमें बसती मेरी औलाद, नगीना मेरा,
थक के वो मेरी गोद में सो जाएगी,
उसे देख के आराम मिलेगा मुझको,
  चैन की नींद मुझे भी आ जाएगी।
धूप इतना ना झुलसाओ मुझको,
आज अपना कर्तव्य निभा लेने दो,
एक निर्धन पिता का किया बेटी से,
अपने वादे को आज निभा लेने दो।

✍️ नीलम द्विवेदी
  रायपुर , छत्तीसगढ़

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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई को नमन
#  29 अक्टूबर, 2020
#  विषय -पिता

पिता घर की कहलाते शान,
पिता से ही है परिवार का मान।
उनके बिना नहीं कोई उत्साह गान,
आप सब अपने पिता का करें सम्मान।

पिता उत्साह-ऊर्जा-चेतना हैं घर की,
पिता से ही हर उन्नति जीवन की।
पिता हैं तो हर मंजिल लगती आसान,
प्रेरणा उनकी न होने देती कभी परेशान।

पिता सबके चाहते सदा हैं मन में यही,
मेरे बच्चे चलते रहें मार्ग पर सही।
जीवन उनका  सुंदर से सुंदरतम हो,
जीवन में मेरे बच्चों का हर पल महानतम हो।

शाम को आते ही पिता के ,
उत्साह से भर उठता है मन
देखकर उनकी कर्मण्य छवि,
कुछ अच्छा कर जाने को कहता है मन ।

आओ बंधुगण ! पितृ दिवस पर ,
आज संकल्प इक यही मन से करो।
चलकर  निर्देशानुसार अपने पिता के,
उनकी आशाओं को मन से पूरा करो।

✍️ अनिल जैन 'अंकुर'
जयपुर ,राजस्थान
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नमन मंच 
# साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
# दिनांक : २९ / १० / २०२०
# दिन : गुरुवार
# विषय : पिता
# विधा : कविता

पिता जगत में पूज्य हैं
संतति के पालनहार
पिता से ही पहचान है
कुल के सृजनहार ।

पिता नाम एक प्रेम है
स्नेह स्रोत उद्गार
स्नेहाशीष शुभकामना
सहृदय सहज अपार ।

सुता - सुत रक्षा के लिए
करते नित नए प्रयोग
निज बाहुबल कर्म से
करते पाई - पाई योग ।

सुख - दुःख में करते सदा
एक समान व्यवहार
भेदभाव को छोड़कर
जन - जन से करते प्यार ।

पिता के पुण्य प्रताप से
घर में वृद्धि होय
पिता हैं एक परमात्मा
चरण पखारें सब कोय ।

पिता की रक्षा का वचन
पुत्र के लिए महान
वृद्ध पिता की सेवा से
समृद्ध होवे संतान ।

✍️ सत्य प्रकाश चौबे
सहायक प्राध्यापक, अंग्रेजी
डी ए वी इंजीनियरिंग कॉलेज
मेदिनीनगर , झारखंड

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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल
#विषय-पिता
#विधा-मुक्तक
#दिनांक-२९-१०-२०

उँगली मेरी पकड़ चलाते।
चलने का अभ्यास कराते।
यहीं पिता बच्चों के खातिर।
कभी कभी घोड़ा बन जाते।।

धन्यवाद
✍️  चन्द्र भूषण निर्भय
बेतिया, पश्चिम चम्पारण
विहार

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नमन
#साहित्य संगम संस्थान
#पश्चिम बंगाल इकाई
विषय ...पिता
विधा ....कविता
29-10-20  गुरुवार

पिता होता परिवार का सुखमय पालनहार ,
बिना पिता के प्यार के सूना सब संसार। 
पिता अपने परिवार की छत्रछाया होता है ,
इसकी मेहनत लगन से ही सबका पालन होता है ।

उनका होता परिवार में बरगद सा स्थान ,
अपने बच्चों के लिए आन बान और शान ।
पिता  बिना संसार में सबका रूप अनाथ ,
पिता की सेवा सब करो जान उन्हें भगवान ।

जो बच्चे है ना करें उनका आदर मान ,
उन बच्चों के त्याग में ना कोई अपराध
अपने जीवन का पार्जन देता बेटे को जान ,
वहीं बेटा उनको करवाता वृद्धाश्रम पहचान ।

पत्नी का श्रृंगार है पिता धर्म का मूल ,
परिवारी हितकार है ना करता कभी गरूर ।
सारा जीवन कोल्हू बन करता धन का मान ,
उसी पिता का  वृद्ध बन होता घोर  अपमान ।

पिता  की सेवा सब करो उसमें मान गुरूर ,
देव बनो या ना बनो मानव बनो जरूर।
जिसके मन प्रज्ञा जगे पिता के प्रति  विनीत ,
उसी डाल पर फल लगें मधुर मिले आशीष ।

✍️ ....सुधा चतुर्वेदी ' मधुर '
                       मुंबई
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#साहित्य संगम संस्थान
#दिनांक- 29.10.2020
#दिन   - गुरुवार
#बिषय - पिता
#विधा   - कविता
     शीर्षक - पिताजी
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हिमालय सा अटल पिताजी
नभ अम्बर  से  भी  ऊँचे  हैं,
आँधियों  में अचल पिताजी
सदा मर्यादा  के  पोषक  हैं ।

संघर्षों में डिगाते कदम नहीं
जिद बच्चों की पूरा करते हैं,
सन्तानों  की  सुख  के लिए
स्वसुख  न्यौछावर  करते  हैं ।

प्रतिपालक   प्रतिहारक  बन
प्रारब्ध  हमारा  भी  रचते  हैं,
पथ प्रदीप्त प्रांजल कर हमारा
प्रतिपालन प्राणांतक करते हैं ।

सहज  सरल  होते  हैं पिताजी
दया  दृष्टि  हम   पर  रखते  हैं,
जग  में सबसे अमूल्य पिताजी
विश्वास  के  अवलम्ब  होते  हैं ।

नित्य  करें  पिताजी  की  पूजा
पिताजी से हम ऊर्जित रहते हैं,
प्यार   बनाये  रखना  उन  पर
पिताजी  हमें  सनाथ  रखते हैं ।
                       
                      ✍️  जय हिन्द सिंह 'हिन्द'
                        आजमगढ़, उ0 प्र0
                       
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#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल
# विषय प्रवर्तन
#विषय पिताजी
#विधा स्वतंत्र
दिनांक 29 अक्टूबर 2020

घर के मुखिया  मेरे पिताजी ,
उनसे   ही  चलता   परिवार।
धरती   पर लाती  प्यारी मां,
हैं   पिता  हमारे  पालनहार।।

मां की  गोद भली धरनी सम,
पिता का गौरव चुमे आकाश।
तिल तिल कर दीप सम जले,
तब परिवार को मिले प्रकाश।।

हैं  बचपन   के  आस  पिता,
वे   बरगद  के   पावन  छांव।
पिता कीअंगुली पकड़ बढ़ते,
शिशु   के   नन्हे   नन्हे   पांव ।।

अपने  जीवन  के संबल को,
तात  कभी  मत  जाना भूल।
हर   बालक  में  भावी  पिता,
यही  सत्य  प्रकृति  का मूल।।

जनक जननी को  मानो देव,
प्रमुदित  होंगे  तब  जगदीश।
मन मंदिर  में  इन्हें बिठा लो,
चरणों मेंउनकेझुकालो शीश ।।

   ✍️  रामप्रवेश पंडित
मेदनीनगर झारखंड।
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🙏#नमन_साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई_मंच🙏
🌷विषय : #पिता ; विधा : #स्वतंत्र🌷
🌹दिनाँक : 29/10/2020 ; दिन : गुरुवार🌹

जग में सबसे सुन्दर ज्ञान, माता - पिता का कर सम्मान।
धरा पे ईश्वर  का  वरदान, माता - पिता का कर सम्मान।।

माता  जी  ने  जन्म  दिया  है,  हमें पिता  ने पाला।
अपनी खुशियाँ  देकर हमको,  जीवन है रंग डाला।।
महिमा न्यारी और महान, माता - पिता का कर सम्मान।।

रात - रात भर जग कर माँ ने, निदिया चैन सुलाया।
सच्चा  ज्ञान  पिता  ने   देकर, सबका मान बढ़ाया।।
पगले मतकर तू अभिमान, माता - पिता का कर सम्मान।।

ममतामयी है  माँ  की  मूरत, धर्म  पिता का   साया।
दोनो ने बलिदान किया  सब, हमको सफल बनाया।।
करले मूरख उनका ध्यान, माता - पिता का कर सम्मान ।।

धरती जैसा रूप है माँ का, अमृत    धारा     बरसे।
आसमान सम पितृ हैं  मेरे, अंखियाँ जिनको तरसे।।
उनकी करुणा है पहचान, माता - पिता का कर सम्मान।।

मात - पिता हैं रूप प्रभू का, सब पर करते दाया।
करले मनवा  भक्ती  उनकी, व्यापे तुझे न  माया।।
करना हरपल उनका ध्यान, माता-पिता का कर सम्मान।।

आरती करते हम  सब उनकी, ले  पूजा की  थाली।
माता - पिता जी  संकट  हरेंगे, खुश हैं कृष्ण मुरारी।।
मनवा पूरा करे अरमान, माता - पिता का कर सम्मान।।

प्रात: उठकर  वंदन कर लो, मात - पिता  का भाई।
आमोद - प्रमोद  तुम्हें  मिले, मानो     ये    सच्चाई।।
होगा जग का सब कल्यान, माता-पिता का कर सम्मान।।

                         
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
-माँ श्री राधारानी के पावन श्रीचरणों की पावन ' रज '
                "कृष्णप्रेमी" गोपालपुरिया प्रमोद पाण्डेय
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐

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#साहित्य संगम संस्थान
बंगाल इकाई
विषय: पिता
विधा: स्वतंत्र
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#पिता_प्यार_की_धूप
******************
जग में माँ के बाद जो,
रखते सबका ध्यान ।
पिता सृष्टि में पूज्य हैं,
वो मेरे भगवान ।।

माँ ममता की छांव तो,
पिता प्यार की धूप ।
दोनों की महिमा बड़ी,
दोनों ईश्वर-रूप ।।

दिखते न आँसू इनके,
आखिर ठहरे मर्द ।
दिल में ही रक्खे छुपा,
मेरे सारे दर्द ।।

सूट-बूट पहना मुझे,
खुद रहे फटेहाल ।
जी जान मेहनत किया,
होकर खुद बेहाल ।।

कंधा चढ़के बाप के,
देखी है संसार ।
ईश्वर से बढ़के तुझे,
करता हूँ मैं प्यार ।।

जीवन ये तूने दिया,
तेरा है आभार ।
चुकता न हो पायेगा,
तेरा ये उपकार ।।

  ✍️   ✒ #विनय_कुमार_बुद्ध
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#साहित्य_संगम_संस्थान_बंगाल_इकाई
#विषय_प्रवर्तन
#गुरुवार (29-10-2020)
#विषय #पिता
विषय-पिता
विधा-कविता
********************
अंगुली पकड़ चलना सिखाया,
कभी गोद ले,आकाश दिखाया,
खुद रोया पर बच्चे का हंसाया,
वो जग में बस पिता कहलाया।

मां धरती है, पिता है आसमान,
युगों से रही, पिता से पहचान,
मां का आंचल, पिता का साया,
ईश्वर रूप में ही, बच्चे ने पाया।

मां स्वर्ग सुख , पिता देवलोक,
दोनों के बल ,मिले सुख भोग,
माता रोती है, पिता नहीं सोता,
कैसा अजब है, जगत संजोग।

मां का दर्द तो, हर जन जानते,
पिता का दर्द, नहीं  पहचानते,
हम ठीक हैं, सदा ही कहते हैं,
परंतु दुख दर्द में दोनो रहते हैं।

राजा जनक भी, पिता कहलाये,
सीता हंसी तो, वो भी मुस्कुराये,
बेटी का दर्द तो पिता को सताये,
विदा होती जब,दर्द में डूब जाये।
***********************
स्वरचित, नितांत मौलिक
*******************
*✍️  होशियार सिंह यादव
मोहल्ला-मोदीका, वार्ड नंबर 01
कनीना-123027 जिला महेंद्रगढ़ हरियाणा

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नमन मंच
साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल ईकाई
बिषय- पिता
विधा- कविता
दिनाँक -29-10-2020
               शीर्षक- पिता
परम ब्रम्ह परमेश्वर से भी,
बढ़ कर होता है इस जग में पिता।
देखभाल सपरिवार की करता है,
और जननी रूप होती है सीता।।
पिता हमारे परिवार के मुखिया है,
परेशानियों के घड़ी में रूप है दीवार का।
संघर्षो के समय धारण कर लेता तलवार का,
परम् पूज्य पिता संरक्षण करता परिवार का।।
पिता जी आसमान से भी ऊँचा है,
उम्मीद के साथ होता है एक और आश।
नही होने देती कोई परेशानियाँ पिता,
पिता में होती है हिम्मत और विश्वास ।।
परिवार के सभी जिम्मेदारी है पिता,
सभी के सपनो को आसानी से पूरा करते हैं।
स्नेह रखता है सपरिवारो के प्रति मे,
खुशी -खुशी से जीवन व्यतीत करते हैं।।
                
         ✍️    देबीदीन चन्द़वँशी
              ग्राम- बेलगवाँ
                तह0पुष्पराजगढ़
                 जिला अनूपपुर
                        म0प्र0
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#नमन_साहित्य_संगम_संस्थान_पश्चिम_बंगाल_इकाई_मंच
#दिनांक - २९/१०/२०२०
#विषय - पिता
#विधा - कविता
#दिन - गुरुवार
#शिर्षक - मेरे पापा
*************

पापा मेरे भोले भाले, करते है सब के रखवाले,
सूरज के जगने से भी पहले, उठ जाते है
वो रोज़ सवेरे ! पापा मेरे भोले भाले ।

जीवन की गति को सार्थक करने में,
दिन को दिन, न रात समझते हैं
वेदना की करुणा मेरे लिए सहते हैं,
पापा मेरे भोले भाले।

नारियल जैसे कठोर ख़ुद को दिखलाते है,
दिल फूलों सा कोमल, करुणा भाव छुपाते हैं,
पापा मेरे भोले भाले।

वटवृक्ष  का छांव है, मेरे सर का ताज हैं
मुश्किलें करते आसां है, खुशियों का भंडार हैं।

धरती पर वो ईश्वर के अवतार है,
उनकी सच्ची सेवा ही ईश्वर की भक्ति हैं।
दुनियां की अनमोल आशीर्वाद है,पापा मेरे भोले भाले।

मैं कृति हूं उनकी,वो मेरे रचनाकार हैं,
उनसे से ही मेरा नाम,पूरा ब्रह्माण्ड में पहचान हैं।

दुनियां का है बीज पिता,कर देते हर चीज आसाँ हैं।
मेरे मन की शक्ति! उनके ही विकल्प की अभिव्यक्ति हैं।
सत सत करूँ प्रणाम मैं,पापा है जो मेरे भोले भाले ।

✍️  पुजा कुमारी साह
जमशेदपुर, झारखंड।
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#नमन साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल इकाई
#दिनांक-29/10/2029
#दिन- गुरुवार
#विषय- पिता
#विधा- स्वैच्छिक (कविता)

पिता  जीवन  में  दु:ख  का  प्याला  पीकर,
जीवन तल को  निर्मलकर सुरभित  किया।
वत्सल  स्नेह  का  सरस   रसधार  बहाकर,
निज  जीवन को पल्लवित, पुष्पित किया॥

पिता   जीवन   का   संरक्षक,  प्रतिपालक,
सदा विचारों सद्   कर्मों  का  ज्ञान देता है।
पुत  अंतःकरण  में शुचि  संस्कार  भरकर,
जीवन समतल  को  ज्योतिर्मय  करता है॥

सद् व्यवहार, सद् वृत्तियों  का  मार्गदर्शक,
उर कलुषता,  पापाचार  को दूर  करता है।
जीवन में ज्ञान  की  ज्योति   विकीर्ण कर,
हृदय के अज्ञान तिमिर को सदा  हरता है॥

पिता    हाथ   पकड़कर  चलना   सिखाया,
प्रिय पिता  जी  मेरे  जीवन  का  अभिमान।
मुसीबतों में पितृ का हिय द्रवित हो उठता है,
पिता  है   इस   जहां  में  साक्षात  भगवान॥

                   
      ✍️   मनोज कुमार चंद्रवंशी
बेलगवाँ जिला अनूपपुर मध्यप्रदेश
__________________________________________
🙏नमन मंच🙏
#साहित्य संगम संस्थान पश्चिम बंगाल
#विषय-पिता
#विधा- कविता
#दिनांक-२९-१०-२०२०

पिता
*****
जेहन में है रहती,
सदैव पिता की तस्वीर।
उसूल-कायदों ने उनके,
बदली हाथों की लकीर।.....

      *****
तात थे एक उम्मीद व
आस के साथ परिवार
की हिम्मत।
कभी चुकता न कर पाएंगे
उनके वात्सल्य
की कीमत।
उनकी यादें हैं हमारे
जीवन की जागीर।
जेहन में है रहती,
सदैव पिता की तस्वीर।...

      *****
संघर्षों की आंधियों में
हौसलों से लड़ना
सिखाया।
अपने अतीत की यादों में
खोकर सीखें अनुभवों से
मिलाया।
पिता के साये वाला
होता है दुनिया का
अमीर।
जेहन में है रहती,
सदैव पिता की तस्वीर।...

      *****
अपने कड़वे मीठे
जीवन के,
अनुभवों की कहानी।
कैसे जीये फ़रेबी
दुनिया में,
सिखाएं नुस्खे सारे ज़बानी।
अपनों के प्रति रखना
निश्छल ज़मीर।
जेहन में है रहती,
सदैव पिता की तस्वीर।...

      *****
जिंदगी में हो ना
कभी कोई तनाव,
रखें जो कर्म के प्रति
समर्पित भाव।
करे गहन जीवन
विपदा पर चिंतन,
मेहनत व हिम्मत के
परिणाम पर मनन।
होता न वह कर्त्तव्यनिष्ठता के
प्रति अधीर।
जेहन में है रहती,
सदैव पिता की तस्वीर।...

✍ महेन्द्र सिंह 'कटारिया'
गुहाला, सीकर (राजस्थान)
__________________________________________
            #पिता

पिता दैवीय शब्द के समान है, इसका न कोई विकल्प या विधान है.
वेदों में कहा स्वर्ग: दुष्ट पिता, भूमि गरीयसी माता अर्थात दुष्ट पिता भी है तो वह स्वर्ग के समान है.
पिता रोटी है, भोजन है, पिता छत है, आसमान है, पिता आँखों की ज्योति और शरीर में धड़कन समान है.
पिता है तो बचपन है वरना बचपन का अवसान है, पिता कन्धा है, आँख है, जीवन की साख है.
जाकर पूछों उन बेटों से जिनके माथे से पिता का साया उठ गया, जिन्हें अब रातें सुहाती नहीं काटने को दौड़ती है.
जो पिता का साया उठ जाने से असमय बूढ़े जैसे दिखने लगे हैं.
आँखे धँसी हुई, चेहरे से मुस्कान गायब है
जिसको देखने से लगता कितना थकावट है.
हे प्रभु! तुम किसी बच्चे को अनाथ न होने देना, गर पिता न दे सको तो तुम स्वयं उसके जीवन में पिता बन जाना.

✍️ डॉ कन्हैयालाल गुप्त किशन
आर्य चौक- बाज़ार भाटपाररानी, देवरिया
उत्तर प्रदेश २७४७०२
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नमो #साहित्य संगम संस्थान,प०बंगाल,
विषय - पिता,
विधा - हाइकु,
नाम - गिरीश इन्द्र,
पता - श्री दुर्गा शक्ति पीठ, अजुवाॅ, आजमगढ़, ऊ ०प्र०-२७६१२७.
दि०-३०-१०-२०२० ई ०.

पिता होता है,
जग परमेश्वर ।
वेद - वचन ।।

पिता का मान,
स्वर्ग से भी ऊंचा है।
मन विचार ।।

पिता सम्मान,
करना सीखो सदा।
फल मिलेगा ।।

पिता की पूंजी,
पुत्र है जगत में।
सर्वदा सत्य ।।

सर्वदा पूज्य,
परमेश्वर जान ।
पिता जग में ।।
०००
✍️  गिरीश इन्द्र।

__________________________________________
1.आ. बृजमोहन रणा ,कश्यप
2. आ.निक्की शर्मा
3. आ.सरिता तिवारी'राखी'
4. आ.कुमार नवीन "गौरव"
5. आ.रजनी हरीश
6. आ.सुधीर श्रीवास्तव
7. आ.सुनील कुमार
8. आ.डॉ. राम कुमार झा
9. आ.स्वाति पाण्डेय
10. आ.डॉ प्रकाश चमोली
11. आ.जमुना प्रसाद उनियाल
12. आ.सुधीर सोनी बाली
13. आ.स्वाति'सरु'जैसलमेरिया
14. आ.पवन सोलंकी
15. आ.फूल चंद्र विश्वकर्मा
16. आ.अर्चना गुप्ता
17. आ.मनोज कुमार पुरोहित
18. आ.सरिता त्रिपाठी
19. आ.दामोदर मिश्र बैरागी,
20. आ.आभा सिंह
21. आ.शिवशंकर लोध राजपूत
22. आ.सरिता श्रीवास्तव,
23. आ.दलीप कुमार झा
24. आ.उदय किशोर साह
25. आ.सीताराम राय सरल
26. आ.एम. एस. अंसारी
27. आ.वर्तिका अग्रवाल
28. आ.रूचिका राय
29. आ.रिपुदमन झा 'पिनाकी'
30. आ.कलावती कर्वा
31. आ.डॉ. आकाश राठौड़
32. आ.मोनिका प्रसाद
33. आ.रवींद्र कुमार शर्मा
34. आ.सुशील शर्मा
35. आ.रोशन कुमार झा
36. आ.विधानाचार्य ब्रःत्रिलोक जैन
37. आ.श्रीकृष्ण चंद्र श्रीवास्तव
38. आ.चंद्रमुखी मेहता
39. आ.अभिलाषा "आभा"
40. आ.रंजना बिनानी
41. आ.गुँजन शुक्ला
42. आ.अभिनव मिश्र"अदम्य
43. आ.बेलीराम कनस्वाल
44. आ.विकाश बैनीवाल
45. आ.जया वैष्णव
46. आ.राम प्रकाश अवस्थी,रूह
47. आ.सुमन राठौड़
48. आ.मीना तिवारी
49. आ.प्रियंका प्रियदर्शिनी
50. आ.राजकुमार प्रतापगढ़िया
51. आ.स्वेता गुप्ता "स्वेतांबरी"
52. आ.प्रेमलता चौधरी
53. आ.नीलम द्विवेदी
54. आ.अनिल जैन 'अंकुर'
55. आ.सत्य प्रकाश चौबे
56. आ.चन्द्र भूषण निर्भय
57. आ.सुधा चतुर्वेदी ' मधुर '
58. आ.जय हिन्द सिंह 'हिन्द'
59. आ.रामप्रवेश पंडित
60. आ.प्रमोद पाण्डेय
61. आ.विनय_कुमार_बुद्ध
62. आ.होशियार सिंह यादव
63. आ.देबीदीन चन्द़वँशी
64. आ.पुजा कुमारी साह
65. आ.मनोज कुमार चंद्रवंशी
66. आ.महेन्द्र सिंह 'कटारिया'
67. आ.डॉ कन्हैयालाल गुप्त किशन
68. आ.गिरीश इन्द्र
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